Tuesday, October 15, 2013

दशहरे की धूम

शहर-दर-शहर दशहरे की धूम



दशहरे की धूम देश की विविधता पर्वो को भी क्षेत्रीय रंगों में भिगोकर एक अलग पहचान देती है। विजयादशमी अर्थात दशहरे के साथ भी ऐसा ही है। रामकथा से जुड़े इस पर्व की धूम देशभर में होती है। असत्य पर सत्य, बुराई पर अच्छाई की विजय के उत्सव के रूप में यह पर्व मनाया जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों में इसकी विभिन्नता उन्हें विशिष्ट भी बनाती है। यही वजह है कि देश के ज्यादातर हिस्सों में जहां इसे रावण,मेघनाद एवं कुम्भकरण के पुतले के दहन के साथ मनाया जाता है, वहीं द्रविड़ प्रदेशों में रावण दहन नहीं किया जाता। इस पर्व के साथ कई दूसरी कथाएं और मान्यताएं भी जुड़ी हैं। इस उत्सव को कृषि, शस्त्र पूजन, अपराजिता देवी और नीलकण्ठ पक्षी से भी जोड़ा जाता है। भिन्नता और भव्यता की कसौटी पर खास पहचान बनाने वाले देश के मुख्य दशहरा आयोजनों पर आधारित यह रिपोर्ट.. गर हमारे देश में कोस-कोस पर पानी और चार कोस पर बानी बदल जाती हो तो हमारे पर्व इन बदलावों से कैसे अछूते रह सकते हैं? विजयादशमी अर्थात दशहरा का पर्व भी अपने मूल में एक मुख्य भावना को लिए होते हुए भी देश के अलग- अलग हिस्सों में अलग-अलग रूप पा जाता है। यह विभिन्नता ही उसे विशिष्ट बनाती है। अगर आपने कुल्लू का दशहरा देखा है तो आप यह नहीं कह सकते कि आप मैसूर के दशहरे को देखने के आनन्द का अनुभव कर सकते हैं। वास्तव में देश के विभिन्न हिस्सों में दशहरा के अलग ठाठ, अलग रंग हैं। तभी तो यह कहीं 10 दिन तक मनाया जाता है तो कहीं इसका आयोजन 75 दिनों तक चलता है। कहीं गरबा होता है तो कहीं उपहार बांटे जाते हैं और कहीं दीप जलाए जाते हैं। रावण और उसके भाइयों मेघनाद और कुम्भकरण के पुतले तो हर जगह जलाए जाते हैं लेकिन कहीं कोई राजनेता तीर छोड़ता है, कहीं भव्य शोभायात्रा के साथ ऐसा किया जाता है। मुख्य मान्यता है कि दशहरा राम कथा से जुड़ा हुआ आयोजन है। कहते हैं कि दस सिरों वाले लंकापति रावण को भगवान राम ने उसके बुरे कर्मो की सजा उसका वध करके दी थी। साथ ही मेघनाद और कुम्भकरण जैसे अत्याचारियों का भी सर्वनाश किया था। यही वजह है कि आज भी रावण के साथ मेघनाद और कुम्भकरण के विशाल पुतलों को जलाया जाता है। हर जगह का दशहरा अपने आप में निराला है। कोलकाता, कोटा, बस्तर, कुल्लू, अल्मोड़ा, मुंबई, मैसूर और दिल्ली जैसे नगरों में दशहरा उत्सव की भव्यता देखते ही बनती है।
अ मैसूर का दशहरा मैसूर का दशहरा अपनी भव्यता के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। माना जाता है कि नवरात्रि उत्सव के आखिरी दिन मैसूर के राजा अपनी प्रजा से मिलने जाते थे और उनके द्वारा दिए गए उपहारों को प्रेम पूर्वक स्वीकार करते थे। यहां दशहरा उत्सव मनाने के साथ-साथ महाभारत काल से जुड़े शमी वृक्ष की भी पूजा की जाती है। उस वृक्ष की पत्तियों को स्वर्ण मानकर सभी लोगों में वितरित किया जाता है। इस वृक्ष को लेकर मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अपने शस्त्रों को यहीं सुरक्षित किया था इसलिए यह वृक्ष न्याय और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। मैसूर वासियों का मत है कि जिस प्रकार पांडवों ने अपने धर्म की रक्षा की उसी प्रकार यह वृक्ष भी उनकी रक्षा करेगा। मैसूर में दशहरे पर एक विशाल प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है। चंदन की लकड़ी से बनी कलाकृतियां, अगरबत्तियां और रेशमी साड़ियों के लिए लोग वर्ष भर इस प्रदर्शनी का बेसब्री से इन्तजार करते हैं। दशहरे के अवसर पर मैसूर महल को सजाया जाता है और करीब पांच किलोमीटर लम्बी शोभायात्रा निकाली जाती है। इस दौरान आतिशबाजी का कार्यक्रम देखते ही बनता है, लेकिन कर्नाटक तथा दूसरे द्रविड़ प्रदेशों में रावण दहन की परम्परा नहीं है।
दिल्ली का दशहरा रावण और उसके पुतला दहन की भव्यता को देखना हो तो दिल्ली के दशहरे को देखना चाहिए। दिल्ली में लगभग 300 रामलीलाएं होती हैं। इनमें से 20 बड़ी रामलीलाएं हैं,जिनका बजट दो से पांच करोड़ का तक का होता है। कमान से छूटे तीरों से आग निकलना, लक्ष्मण रेखा पार करने पर रेखा से आग निकलना, वायु मार्ग से हनुमान का संजीवनी बूटी लाना, लक्ष्मण-मेघनाद का जमीन से 45 फिट ऊंचाई पर मायावी युद्ध, सीता हरण के लिए हेलीकॉप्टर का प्रयोग, 90 मीटर के तीन तल वाले मंच, रावण के भव्य पुतले का निर्माण, कुं भकर्ण को क्रेन से उठाने की व्यवस्था, लीला के प्रवेश द्वारों का भव्य निर्माण आदि इस आयोजन में गजब का रोमांच भर देते हैं। राम बारात में शामिल स्वचालित झंकियों ने दिल्ली की रामलीला को पूरे भारत में प्रसिद्ध कर दिया है। रामलीला मैदान में प्रतिवर्ष होने वाले दशहरा उत्सव की ख्याति इस कारण भी है कि इसमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित कई केन्द्रीय मंत्री और राजनेता भाग लेते हैं।
कोलकाता का दशहरा कोलकाता में दशहरा का उत्सव मुख्यत: नवरात्रि पर्व और शक्तिपूजा से जुड़ा है। वैसे भी रामकथा के अनुसार यह मान्यता है कि राम ने रावण के वध के पूर्व देवी की उपासना की थी। दुर्गापूजा बंगालियों का सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है। यहां दशहरा मुख्यत: पांच दिनों तक मनाया जाता है। देवियों को भव्य पंडालों में रखा जाता है। साल भर अपनों से दूर रहने वाले लोग विजयादशमी के दिन घर जरूर आते हैं। बच्चे बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं और बड़े भी प्रेम भाव से उनका आलिंगन करते हैं। इस प्रथा को बंगाली में ‘कोलाकुली’ कहा जाता है। इसके अतिरिक्त पास पड़ोस वालों को शुभो विजया की बधाई दी जाती है। विजयादशमी के दिन देवियों को नदी में विसजिर्त करने से पहले महिलाओं द्वारा ‘सिंदूर खेला’ नामक प्रथा का प्रचलन है। वे एक पंडाल में इकट्ठा होकर देवियों की पूजा अर्चना के बाद एक दूसरे की मांग में सिंदूर भरकर विवाह सम्बन्धों की प्रगाढ़ता की प्रार्थना करती हैं। इस उत्सव पर बनने वाले व्यंजनों में मालपुआ और निमकी खासतौर पर लोकप्रिय हैं।
अल्मोड़ा का दशहरा अल्मोड़ा अत्यंत सुन्दर व सुरम्य पर्वतीय स्थलों में से एक है। यदि एक बार अल्मोड़ा के आसपास की नैसर्गिक सुन्दरता एवं दशहरा महोत्सव को देख लिया तो निश्चित ही मन बार-बार यहां आने को करेगा। अल्मोड़ा का दशहरा महोत्सव साम्प्रदायिक सौहार्द का प्रतीक भी है। यूं तो अल्मोड़ा में राक्षस परिवार के पुतले देश के अन्य भागों की तरह ही बनाये जाते हैं, लेकिन अन्य स्थानों की अपेक्षा यहां के पुतले कलात्मकता और भव्यता के साथ उन कलाकारों के द्वारा निर्मित होते हैं जो किसी भी तरह से पेशेवर नहीं हैं। ये कलाकार हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई अथवा किसी भी धर्म, सम्प्रदाय के हो सकते हैं। अल्मोड़ा में दशहरा महोत्सव की तैयारी एक माह पहले से ही शुरू हो जाती है। बच्चों भी अपने लिए छोटे-छोटे पुतले लेकर आते हैं। कई जगह इन पुतलों को टेसू कहा जाता है। वहीं दशहरा आयोजन में अल्मोड़ा का हर मोहल्ला रावण परिवार के पुतलों के निर्माण के लिए सक्रिय हो जाता है। इन पुतलों की नयनाभिराम छवि, आंख, नाक तथा विशिष्ट अवयवों को अनुपात देने में यहां के शिल्पी अपनी समस्त कला झोंक देते हैं। दशहरे के दिन दोपहर से यह पुतले अपने निर्माण स्थल से निकलते हैं। पुतलों की यात्रा यहां के मशहूर लाला बाजार से एक जुलूस के रूप में प्रारंभ होती है। इन पुतलों में रावण, मेघनाद, कुम्भकर्ण, ताड़का, सुबाहु, त्रिशरा, अक्षयकुमार, मकराक्ष, खरदूषण, नौरा आदि के पुतले अनोखी आभा लिए होते हैं। पहले यह पुतले शहर में जुलूस के रूप में नहीं आते थे। एक दशक पूर्व अख्तर भारती जैसे कलाकारों ने मेघनाद के पुतले से इस उत्सव को जो दिशा दी उसी का परिणाम है कि आज एक दजर्न से ज्यादा पुतलों का जुलूस निकाला जाता है।
कुल्लू का दशहरा कुल्लू में दशहरा देवताओं के मिलन के रूप में मनाया जाता है।
माना जाता है कि देवता जमलू ने कई देवताओं को एक साथ टोकरी में उठाकर किन्नर कैलाश की ओर से कुल्लू पहुंचाया था।
तभी से कुल्लू को देवताओं की भूमि माना जाता है। देश के दूसरे भागों में जब विजयादशमी समाप्त हो जाती है, तब कुल्लू में इसका आयोजन शुरू होता है। दशमी से पूर्णिमा तक कुल्लू के ढाल मैदान में देवता साज-सज्जा और गाजे-बाजे के साथ लाए जाते हैं। लोगों की परंपरागत वेशभूषा और नृत्य के कारण कुल्लू का दशहरा बहुत मनमोहक होता है। मेले का मुख्य आकर्षण रघुनाथ जी की यात्रा होती है, जिसमें राजपरिवार के सदस्य राजसी वेशभूषा में सम्मिलित होते हैं। इस अवसर पर द्वापर युग की राक्षसी हिडिंबा के प्रतीक की उपस्थिति भी अनिवार्य मानी जाती है। उनके बिना रघुनाथ जी की यात्रा सम्पन्न नहीं होती है।
यात्रा के दौरान कृत्रिम रूप से बनाई लंका को जलाकर दशहरे को सम्पन्न किया जाता है और लौटते समय रघुनाथ जी के साथ सीता जी को भी विराजमान किया जाता है। इस प्रकार यह पर्व राम द्वारा लंका से सीता को छुड़ाकर लाने का प्रतीक माना जाता है।
बस्तर दशहरा की अनूठी परम्परा छत्तीसगढ़ के बस्तर का दशहरा का अपना ही रंग है। बस्तर में 75 दिन तक दशहरे का उत्सव मनाया जाता है। आस्था है कि वनवास के दौरान भगवान राम ने 14 दिन बस्तर में व्यतीत किए थे। यहां दशहरा पर्व के जुलूस में मां दंतेश्वरी देवी के छत्र की अनूठी रथयात्रा निकलती है । शोभायात्रा का मुख्य आकर्षण द्वितलीय रथ होता है। इस रथ को आदिवासी ही खींचते हैं। रथ को तैयार करने की लगभग 598 वर्षों से एक अनूठी पंरपरा है।
इसे बनाने का काम सिर्फ संवरा जाति के लोग ही करते हैं। इस जाति की यह परंपरा काफी समय से है। यह रथ काफी बड़ा होता है और कई तरह की चीजों से सुसज्जित होता है। दशहरा पर लाखों की संख्या में लोगों की भीड़ यहां उमड़ती है। ढोल नगाड़े ताशे बजाकर पूरे माहौल को ऐसा बना दिया जाता है कि मानो कोई विजयश्री प्राप्त कर लौट रहा हो। छत्तीसगढ में रथ बनाने वाली संवरा जाति के लोग अब आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं।
आज भी इन्हें रथ के मेहनताना के नाम पर मामूली राशि,एक बकरा और कुछ वस्तुएं ही मिलती हैं। छत्तीसगढ़ पर्यटन विभाग इस मौके पर निकलने वाली शोभायात्रा में एक हजार दीपों को प्रज्ज्वलित कराता है।
कोटा का दशहरा मेला कोटा का दशहरा भी देश भर में अपनी अलग पहचान रखता है। इस अवसर पर एक विशाल मेला लगता है, जो अपनी भव्यता और व्यापक जनभागीदारी के कारण देश भर में प्रसिद्ध है। दशहरा तक मेले की धूम शहर में रहती है। राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत यहां के मेले में अलग ही समां बांधती है।
कोटा राजस्थान के दक्षिणी भाग के हाड़ौती क्षेत्र में स्थित है।
चम्बल के पूर्वी किनारे पर स्थित कोटा में दशहरे से काफी पहले ही तैयारियां प्रारम्भ होने लगती हैं। रावण और उसके प्रमुख सेनानियों, मेघनाद व कुम्भकर्ण के विशाल पुतलों के निर्माण की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। दशहरा से दो महीने पहले ही पुतलों का निर्माण कार्य होने लगता है। दूर- दराज से पुतले बनाने के कारीगर यहां जुटने लगते हैं। पुतलों को भव्य बनाया जाता है।
कोटा का रावण दहन देशभर में प्रसिद्ध है। रावण, मेघनाद, कुम्भकर्ण के विशाल पुतले रंगीन कागज और बांस की खपच्चियों से तैयार होते हैं। इनमें बड़ी मात्रा में पटाखे और बारूद भरा रहता है। राम के स्वरूप रावण के पुतले की नाभि में तीर मारकर उसका दहन करते हैं। दशहरा के साथ भव्य रामलीला का आयोजन भी चलता है।
दशहरे पर जहां पूरा देश रावण का पुतला जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाता है, वहीं एक जगह ऐसी भी है, जहां मातम और सन्नाटा पसरा रहता है। लोगों पर दशहरे का खौफ छाया रहता है क्योंकि यहां आज तक जिसने भी दशहरा मनाने की कोशिश की वह दूसरा दशहरा नहीं देख पाया, उसकी मौत हो गई। हिमाचल प्रदेश का बैजनाथ अपने प्राचीन शिव मंदिर के कारण पूरे साल सैलानियों की चहल-पहल से गुलजार रहता है। दशहरे के दिन इस पूरे शहर में वीरानी छाई रहती है। मान्यता है कि यहां पर रावण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तप करते हुए अपने दस शीश अर्पित कर दिए थे। इलाके के लोगों की माने तो जिसने भी दशहरा मनाने की कोशिश की वह अगला दशहरा नहीं देख पाया। खास बात यह भी है कि पूरे शहर में एक भी सुनार की दुकान नहीं है। अगर दुकान खोली भी गई तो वह जलकर खाक हो गई। इलाके के राम दित्ता ने बताया कि जिस किसी ने भी रामलीला या दशहरा मनाने की कोशिश की उसकी मौत हो गयी। लोगों में धारणा बन गयी की ऐसा रावण की नाराजगी के कारण हुआ।
बैजनाथ मंदिर के पुजारी के मुताबिक यहां पर रावण ने शिव को अपने दस शीश भेंट किये थे। तब से इसे रावण की तपस्थली के तौर पर जाना जाता है और उसके सम्मान में ही दशहरा नहीं मनाया जाता। यहां तक की सोने की लंका के चक्कर में शहर में कोई सोने की दुकान तक नहीं है। उन्होंने बताया कि बैजनाथ में रावण का एक मंदिर भी है, जहां उसके पैरों के चिह्न हैं और रावणोश्वर लिंग भी है।
हालांकि यह हिस्सा काफी खराब हो चुका है।
जहां आज भी नाराज है रावण महाराष्ट्र में दशहरा दशहरा महाराष्ट्र में सिलंगण के नाम से सामाजिक महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यहां भी मैसूर की तरह ही सायंकाल के समय सभी ग्रामीणजन सुंदर-सुंदर नये वस्त्र धारण कर गांव की सीमा पार कर शमी वृक्ष के पत्ताें को अपने गांव लाते हैं। फिर उन पत्ताें का परस्पर आदान-प्रदान करके बड़े-बूढ़ों के पांव छू कर आशीर्वाद लेते हैं। इस अवसर पर समूचे गांव में भक्ति रस में डूबे लोकगीतों को गाया जाता है।
दक्षिण में दशहरा तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश तथा कर्नाटक में दशहरा नौ दिनों तक चलता है, जिसमें लोग लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा की पूजा करते हैं। पहले तीन दिन लक्ष्मी का पूजन होता है। अगले तीन दिन सरस्वती की अर्चना की जाती है और अंतिम दिन देवी दुर्गा की स्तुति की जाती है। पूजा स्थल को दीपकों से सजाया जाता है। दशहरा यहां के बच्चों के लिए खासतौर पर शिक्षा या कला संबंधी कोई नया काम सीखने के लिए शुभ माना जाता है।

विजयदशमी का त्योहार


 पापों को हरने का त्योहार
त्योहार लोक जीवन की प्रगाढ़ता के केन्द्र बिन्दु माने जाते हैं। यह न केवल हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक जीवन को प्रभावित करते हैं वरन इनके साथ हमारी आर्थिक गतिविधियाँ भी पूरी तरह से जुड़ी हुई हैं। त्योहार पग पग पर व्यक्ति को समाज के साथ जोड़ते हैं। प्रकृति के बदले परिधानों के साथ जुड़े त्योहार फूलों के बदलते रंगों की भाँति व्यक्ति को लुभाते रहते हैं। इनकी विविधता मानव को अपने मोहपाश में बाँधे रखती है।
विजयदशमी का त्योहार वर्षा ऋतु की समाप्ति तथा शरद के आगमन की सूचना देता है। ब्राrाण इस दिन सरस्वती का पूजन करते हैं जबकि क्षत्रिय शस्त्रों की पूजा करते हैं। अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में यह त्योहार सदियों से भारत के कोने कोने में मनाया जाता है। सीधे सरल रूप से भारतीय जनमानस ने यह स्वीकार कर लिया है कि इस दिन भगवान राम ने असुर रावण पर विजय पाई थी जबकि अनेक विद्वान इस बात को भ्रामक मानते हैं।
एक अन्य कथा के अनुसार परशुराम की माता रेणुका ने शापग्रस्त देवताओं के आग्रह पर उनके कुष्ठ रोग दूर करने के लिए अपने पति ‘भृगु’ की आज्ञा के बिना नौ दिन तक देवताओं की सेवा की फलत: दसवें दिन उनका कोढ़ दूर हो गया। शाप मुक्त होने के कारण देवताओं ने यह दिवस दु:ख मुक्ति अथवा विजय दिवस के रूप में मनाया। इस दिन आश्विन शुक्ला दशमी थी अत: तभी से यह दिन विजय दशमी के रूप में मनाया जाने लगा। इसी प्रकार इस दिन को नरकासुर राक्षस के वध के साथ भी जोड़ा जाता है। कहते हैं कि नरकासुर ने अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए 1600 स्त्रियों की बलि देने का निश्चय किया। उसे वरदान प्राप्त था कि उसका वध केवल नारी द्वारा ही होगा। भगवान श्री कृष्ण ने ‘सत्यभामा’ के हाथों उसका वध करवाया। नरकासुर के हाथों बच जाने के कारण नारियों ने इसे विजय पर्व के रूप में मनाया।
चाहे राम ने रावण का संहार किया हो अथवा अजरुन द्वारा कौरवों पर विजय पाई गई हो-यह दिवस सर्वत्र निर्विवाद अधर्म पर धर्म की जीत के रूप में मनाया जाता है।
दशहरा एक प्रतीक पर्व है। राम-रावण के युद्ध में जिस रावण की कल्पना की गई है वह है मन का विकार और विकार रहित परम पुरुष हैं राम। सीता आत्मा है जबकि राम स्वयं परमात्मा। आत्मा का अपहरण जब रावण ने किया तो चारों ओर धर्म नष्ट होने लगा लोग वानरों की भाँति चंचल और उच्छृंखल होने लगे तब राम ने उनको अर्थात उनके काम-क्रोध-मोह आदि को अनुशासित किया तभी रावण का वध संभव हो पाया। राम और रावण विपरीतार्थ के बोधक हैं। रावण का अर्थ है रुलाने वाला जबकि राम का अभिप्राय है लुभाने वाला। रावण के दस सिर कहे गए हैं। उसका सिर तो एक ही है शेष काम, क्रोध, मद, मोह, मत्सर, लोभ, मन, बुद्धि और अहंकार को उसके सिरों के रूप में स्वीकार किया गया है।
महाराष्ट्र और उससे लगे भू प्रदेशों में दशहरे के दिन आपटा अथवा शमी वृक्ष की पत्तियाँ अपने परिजनों एवं मित्रों में सवर्ण के रूप में वितरित करने की प्रथा है। आपटा वृक्ष की पत्तियाँ मध्य से दो समान भागों में विभक्त रहती हैं। यह वृक्ष गाँव की सीमा से बाहर ही होते थे। इस पत्ती को गाँव की सीमा से बाहर जा कर तोड़ना ही सीमोल्लंघन है। यह पत्ती द्वैत वृत्ति पार कर अद्वैतवृत्ति में जा कर दशेंन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने का प्रतीक है। इसी प्रकार शमी की पत्तियाँ सुवर्ण मान कर वितरित की जाती हैं। शमी वृक्ष की पत्तियाँ बुद्धि के देवता गणोश जी को अर्पित की जाती हैं। शम् अर्थात् कल्याणकारक। ‘शमीं’ वह कल्याणकारी अवस्था है जो बुद्धि के देवता की शरण में जाने पर प्राप्त होती है। बुद्धि के देवता की शरण में जाने का अर्थ भी दशेन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना ही है। कई शताब्दीयों से मनाये जाने वाले इस त्योहार को मध्य युगीन राजाओं, महाराजाओं ने नए आयाम दिए, कुल्लू, कोटा, और कर्नाटक में आज भी 14वीं शताब्दी की कई बातों की झलक मिल जाती है। कुमाउँ का दशहरा भी उत्तर भारत में रामायण के पात्रों के पुतलों के कारण काफी चर्चित है।
कुल्लू में दशहरा देवताओं के मिलन का मेला मान कर मनाया जाता है। विश्वास किया जाता है कि देवता जमलू ने देवताओं को एक टोकरी में उठा कर किन्नर कैलाश की ओर से कुल्लू पहुँचाया था। तभी से कुल्लू देवताओं की भूमि मानी जाती है और यहाँ पर देवताओं का मिलन प्रति वर्ष होता है। कुल्लू घाटी के प्रत्येक गाँव का अपना ग्राम देवता होता है। प्रत्येक देवता का अपना मेला लगता है। देश के दूसरे भागों में विजय दशमी के समाप्त होते ही आश्विन शुक्ल दशमी से पूर्णिमा तक कुल्लू के ढाल मैदान में सभी देवता सज धज कर, गाजे बाजे के साथ लाये जाते हैं। परम्परागत वेश भूषा में सजे स्त्री पुरुष देवता की सवारी के साथ आते हैं। कुल्लू की घाटी के कण कण में लोक नृत्य, संगीत और मस्ती भरी हुई है फलत: यह मिलन स्थली विभिन्न प्रकार के बाह्य यंत्रों के स्वरों एवं लोक नर्तकों की थापों पर थिरक उठती है।
दक्षिण भारत में कर्नाटक प्रान्त के मैसूर नगर का दशहरा भी अपनी भव्यता और तड़क भड़क के लिए विश्व प्रसिद्ध है। कन्नड़ में दशहरे को नांदहप्पा अर्थात राज्य का त्योहार कहा जाता है। 15वीं शताब्दी में मैसूर के लोकप्रिय एवं कलाप्रेमी राजा कृष्ण देव राय ने इस उत्सव को राजकीय प्राश्रय दिया, नवरात्रि उत्सव के अन्तिम दिन राजा हाथी पर सवार हो कर नागरिकों के मध्य जाते और उनके द्वारा सम्मानपूर्वक दिए गये उपहार प्रेम से स्वीकार करते। राजमहल से चल कर राजा की यात्रा नगर सीमा बाहरबली मंडप तक जाती। यहाँ पर दशहरे के साथ महाभारत काल से ही जुड़े शमी वृक्ष की पूजा की जाती और इस वृक्ष की पत्तियों को सुर्वण मान कर परिजनों में वितरित किया जाता है। महाराष्ट्र में भी दशहरे पर आपटा वृक्ष की पत्तियों को स्वर्ण मान कर बाँटने की प्रथा है। वास्तव में आपटा वृक्ष की पत्तियाँ मध्य से दो समान भागों में विभक्त रहती हैं। दिखने में अत्यन्त सुन्दर यह पत्ती अद्वैत और बुद्धिमत्ता का प्रतीक मानी जाती है। इन्हें अभिवादन और उज्‍जवल भविष्य का सूचक माना जाता है। इसी कारण इसे मित्रों में वितरित करने की प्रथा है।
शमी वृक्ष के संबंध में विद्वानों का मत है कि पांडवों ने अपने एक वर्ष के अज्ञातवास में इसी वृक्ष पर अपने अस्त्र शस्त्र छिपा कर रखे थे। इस वृक्ष को न्याय, अच्छाई और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। कर्नाटक के निवासियों का मत है कि जिस प्रकार पांडवों ने धर्म की रक्षा की उसी प्रकार से यह वृक्ष उनकी तथा उनके परिजनों की रक्षा करेगा।
इस त्योहार को प्राश्रय देने वाला विजय नगर राज्य अपने अपार वैभव के लिए विश्व प्रसिद्ध था फलत: राजा की सवारी बहुत ही भव्यता के साथ निकाली जाती थी।
आजकल जुलूस में राजा का स्थान महिषासुरमर्दिनी चांमुडेश्वरी देवी की प्रतिमा ने ले लिया है। चामुंडेश्वरी देवी का मन्दिर मैसूर महल से थोड़ी ही दूर एक सुन्दर पहाड़ी पर बना हुआ है।
मैसूर में दशहरे के अवसर पर एक विशाल प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है। इसमें देश भर से व्यापारी पहुँचते हैं। राज्य के महत्त्वपूर्ण कला-शिल्प यहाँ पूरी सज धज के साथ रखे जाते हैं।
चन्दन की लकड़ी से बनी कलाकृतियाँ, अगरबत्तियों और रेशमी साड़ियों के लिए लोग इस उत्सव की वर्ष भर प्रतीक्षा करते हैं।
सांस्कृतिक गतिविधियों की चहल पहल से भरे वातावरण में मैसूर का राजमहल जब विद्युत के प्रकाश से जगमगाता है तो उसकी छटा देखते ही बनती है।
कुल्लू और कर्नाटक की ही भाँति कोटा, राजस्थान का दशहरा भी पिछले पांच सौ वर्ष से हडौती संभाग की जनता के लिए आकर्षक का केन्द्र बना हुआ है। उत्तर भारत का यह सबसे प्राचीन दशहरा माना जाता है। कोटा के महाराजा इसे शक्ति पर्व के रूप में मनाते आये हैं। 15वीं शताब्दी में राव नारायण दास ने मालवा सुल्तान महमूद को परास्त करने के उपलक्ष में इसे प्रारम्भ किया था।
1571 में कोटा राज्य की स्थापना के साथ राव माधे सिंह ने यहाँ लंका पुरी का निर्माण कराया और पुतलों के स्थान पर मिट्टी के रावण-वध की प्रथा डाली। स्वतंत्रता प्राप्ति तक यहाँ 15.20 फुट ऊंचे रावण, मेघनाथ और कुम्भकर्ण के मिट्टी के पुतले बनाये जाते थे। उनके गले में बंधी जंजीर को खींच कर राजदरबार का शाही हाथी उनका वध करता था। 1771 में जब महाराव उम्मेद सिंह गद्दी पर बैठे तो उन्होंने इस उत्सव के सार्वजनिक रूप को निखारा।

Monday, October 7, 2013

after log time...

Ek Bar Suno Kuch Aisa Hua
Wo Mujko Mila, Main Usko Mili
Pyar Hua, Izhar Hua
Wo Dost Bana Me Yar bani
Use Ishq Bahut, Mujhe Pyar Bahut
Hum dono me takrar Bahut
Phir Kuch Yun Hua...
Wo Chorh Gaya Main Toot Gayi

after log time...

Phir Kuch Yun Mile...
Wo Tanha Tha, Main Akeli Thi
Bas Hum Do The, Or Koi Na Tha
Wo Rone Laga, Main Bebas Rahi
Na Pyar Raha.. Na Izhar Raha
Bas Farq Sirf Itna Sa Raha
WO MITI K UPAR ROTA RAHA
ME MITTI K ANDAR SOTI RAHI...

Saturday, October 5, 2013

अनजान मोबाइल नम्बर खुलासा करती वेबसाइट्स

अनजान मोबाइल नम्बर खुलासा करती वेबसाइट्स

अगर आपको किसी अनजान नंबर से मिस्ड कॉल या मैसेज आ रहा है तो अब आप उसकी लोकेशन और उससे जुड़ी दूसरी बातों का पता आसानी से लगा सकते हैं। अब तक ऐसे मोबाइल नंबरों की लोकेशन पता लगाने के लिए आपको बार-बार उस पर कॉल करनी होती थी या कस्टमर केयर सेंटर पर कॉल कर के आप पता करने की कोशिश करते थे। लेकिन अब कहीं कॉल करने की जरूरत नहीं।
इंटरनेट पर मौजूद कुछ वेबसाइट्स से आप उनके बारे में पूरी जानकारी ले सकते हैं और मिस्ड कॉल देने वाले को उसके बारे में ही सटीक जानकारी दे कर चौंका सकते हैं। इनका इस्तेमाल करके आप न सिर्फ भारतीय मोबाइल नंबर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नंबरों के बारे में भी जानकारी पा सकते हैं।
इन नंबरों का पता लगाने के लिए आपको कुछ खास करने की जरूरत नहीं और न ही कोई डिवाइस या उपकरण चाहिए। बस चाहिए तो एक कंप्यूटर या लैपटॉप और एक इंटरनेट कनेक्शन। अनजान नंबरों का पता लगाना बहुत ही आसान है। इसके लिए एक नहीं, बल्कि कई सारी वेबसाइट्स मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल कर के किसी भी मोबाइल नंबर की लोकेशन सर्विस देने वाली कंपनी, सिम का प्रकार जैसे जीएसएम या सीडीएमए और इससे जुड़ी कई बातें आप पता कर सकते हैं। ये साइट्स किसी नंबर के रिकॉर्ड की जानकारी भी देती हैं।

सबसे पहले भारतीय मोबाइल नंबरों के बारे में बात करते हैं। भारतीय मोबाइल नंबरों के बारे में कई साइट्स से जानकारी ली जा सकती है।
trace.bharatiyamobile.com
यह साइट 119 करोड़ भारतीय मोबाइल नंबरों के बारे में जानकारी मुहैया करा सकती है। इस साइट से किसी भी नंबर की जानकारी के लिए सर्चबार में वो नंबर टाइप करना होगा, जिसके बारे में आप जानकारी चाह रहे हैं। इसमें केवल दस अंकों का मोबाइल नंबर ही टाइप करना है। उससे पहले 91 नहीं लगाना है। यह साइट केवल भारतीय मोबाइल नम्बरों की ही जानकारी देती है। जैसे ही इस पर नंबर टाइप कर के ट्रेस पर क्लिक करेंगे, यह साइट मोबाइल नंबर की लोकेशन, उस कंपनी का नाम जो सिग्नल दे रही है और यह किस प्रकार का सिम है, इन बातों के बारे में जानकारी उपलब्ध कराएगी। इसमें 7 और 8 मोबाइल नंबरों की सिरीज भी शामिल है।
www.hacktrix.com
यह दूसरी साइट है, जो मोबाइल नंबर के बारे में जानकारी प्रदान कर रही है। इस साइट में सर्च बार को जहां नंबर टाइप करना है, पर जाकर दिए हुए लिंक से भी खोला जा सकता है और ऊपर लिखे हुए लिंक से भी सीधे खोला जा सकता है। इसमें जब सर्च बार में मोबाइल नंबर लिख कर क्लिक करेंगे तो यह साइट भी मोबाइल नंबर के बारे में बहुत सी जानकारियां उपलब्ध करा देगी। इसमें भी 91 लगाने की जरूरत नहीं है। यह मोबाइल नंबर के रीजन के बारे में बताती है, लेकिन एक बात जो इन सब साइट्स में समान है, वो यह कि कोई भी साइट फोटो आईडी या एड्रेस के बारे में जानकारी नहीं देती। केवल लोकेशन, टेलिकॉम कंपनी, सिम की टेक्नोलॉजी और इसी तरह की कुछ जानकरियां देती है। ये कोई मोबाइल डायरेक्टरी नहीं है, इसलिए फोन करके या ई-मेल कर के किसी व्यक्ति विशेष की फोटो आईडी या एड्रेस प्रूफ के बारे में जानने की कोशिश न करें। यह साइट वही जानकारी देती है, जिसके लिए टेलिकॉम कंपनी ने इजाजत दी है।
www.informationmadness.com
यह साइट केवल भारत और पकिस्तान के मोबाइल नम्बरों की जानकारी देती है। जब यह साइट ओपन होकर आएगी तो सीधे सर्च बार का ऑप्शन नहीं आएगा। इसके लिए साइट में दाईं ओर मिस्ड कॉल फाइंडर नाम का लिंक दिया गया है। आपको इस लिंक पर क्लिक करना है। उसके बाद सर्च बार खुलेगा और साथ में सेलेक्ट कंट्री नाम का एक ऑप्शन भी दिखाई देगा। सबसे पहले आपको देश (भारत या पकिस्तान) चुनना है। फिर सर्च बार में वो नंबर डाल दें, जिसके बारे में आप जानकारी चाहते हैं। इसके बाद सर्च पर क्लिक करते ही मोबाइल नंबर, उसके टेक्नोलॉजी टेलिकॉम ऑपेरटर और नंबर के रीजन के बारे में जानकारी मिल जाएगी।
http:tp2location.com
यह साइट अंतरराष्ट्रीय नम्बरों के बारे में जानकारी देती है। इसको ऑपरेट करने के दो तरीके हैं। सबसे पहले अगर आप अमेरिका या कनाडा के किसी नम्बर को खोजना चाहते हैं तो यूएस/कनाडा वाले ऑप्शन पर क्लिक करना है और यदि किसी अंतर्राष्ट्रीय नम्बर को खोजना चाहते हैं तो इंटरनेशनल वाले ऑप्शन पर क्लिक करें।
जिस देश के मोबाइल नंबर की जानकारी लेना चाहते हैं, उस देश का मोबाइल कोड नंबर से पहले लगाएं। जैसे भारत के किसी मोबाइल नम्बर के लिए 91 या दुबई के किसी नंबर के लिए 971 लगा कर इंटरनेशनल वाले ऑप्शन पर क्लिक करने पर पता चल जाएगा कि किस देश का नंबर है, उस देश का कोड क्या है, उसकी टेक्नोलॉजी क्या है और टेलिकॉम नेटवर्क यानी किस कंपनी का नंबर है आदि।
साथ में एक संबंधित संपदा नाम का ऑप्शन भी दिखाई देगा, जिस पर क्लिक करके उस नंबर के बारे में और भी जानकारियां जुटाई जा सकती हैं। अगर नंबर से पहले देश का मोबाइल कोड नहीं डालेंगे तो यह साइट नंबर के बारे में गलत जानकारी दे सकती है।
अब करें घर बैठे ऑनलाइन प्रीपेड मोबाइल रीचार्ज
अब कर सकते हैं ऑनलाइन मोबाइल रीचार्ज, वो भी घर बेठे। जी हां अब मोबाइल रीचार्ज करने के लिए कूपन की जरूरत नहीं, बल्कि सीधे आईसीआईसीआई बैंक के अकाउंट से ऑनलाइन रीचार्ज किया जा सकता है। www.icicibank.com पर जाकर ये स्टेप्स फॉलो करें।
1. नेट बैंकिंग यूजर आईडी और पासवर्ड वाला ऑप्शन खोलें।
2. ऑनलाइन बिल पे ऑप्शन पर जाएं।
3. प्रीपेड मोबाइल रीचार्ज पर क्लिक करें।
4. अपने मोबाइल नम्बर का रीजन और टेलिकॉम कंपनी चुनें।
5. अपना मोबाइल नम्बर और रीचार्ज की धनराशि भरें।
6. अंतिम चरण में ट्रांजेक्शन पासवर्ड भर कर उसे पूरा करें।

Friday, October 4, 2013

इंसानियत


कहाँ से और कैसे आया था यह तो भगवान ही जानता था
पांच-छे साल का एक बच्चा चार-पांच दिन से सिग्नल पर नज़र आया था 
चिलचिलाती धूप में नंगे पैर निक्कर और बनियान पहने सिगनल पर खड़ी होती
 गाड़ी को दौड़कर अपनी शर्ट से साफ़ करता और उसके बाद पैसे लेने के लिए हाथ बढ़ाता 
कुछ नरम दिल इंसान पैसे दे देते, कुछ गुस्से से झिड़क देते 
कुछ बिना कुछ दिए गाड़ी आगे बड़ा देते
वो कुछ देर गाड़ी से उडती हुई धूल को मायूसी से देखता
फिर अगला सिगनल होने पर गाड़ियाँ साफ़ करने दौड़ पड़ता
जब कुछ पैसे इकट्टे हो जाते तो फुटपाथ पे खड़े खाने के ठेले के पास खड़ा हो जाता
ठेले वाला भी खाना मांगने पर उसको झिड़क देता
पहले तो अपने और ग्राहकों को निपटाता
भूखा  बच्चा जब तक खाने को भूखी नज़रों से देखता
सब से आखिर में उस बच्चे से पूछता
पहले वो बच्चे से गिनकर पैसे ले लेता
फिर भी उसे बासी बचा-खुचा खाना पकड़ा देता
भूखा बच्चा वहीँ नीचे बैठकर अपना पेट भरता
वही कोने के नल से पानी पी लेता
और चुप चाप पास ही पेड़ की छाया में लेट जाता
एक रात पता नहीं उस बच्चे ने क्या खाया
उसके पेट में जोर से दर्द उठ आया
वो रोया-चिल्लाया पर किसी को तरस नहीं आया
राहगीर दो मिनिट रुकता,ठिठकता फिर मुसीबत के
 डर से अपनी मंजिल पर बढ जाता
रात में तड़प-तड़प कर वो बच्चा इस दुनिया को अलविदा कर गया
सुबह जब कौओ के झुण्ड और शोर से
इंसानों की नज़र पड़ी
तो उनकी भीड़ भी उसके आस-पास बढ़ी
एक इंसान ने मेहरबानी की, पुलिस को फ़ोन द्वारा इत्तिला कर दी
नगर निगम की लावारिश लाश उठाने वाली गाड़ी आई
और उस बच्चे की लाश को उठा कर ले गयी
सिगनल पर भागते दौड़ते उस बच्चे की
तो कहानी यहीं समाप्त हो गयी
दुनिया तो इस ही तरह चलती रही

पर इंसानियत फिर इस दुनिया को रुसवा कर गयी

Wednesday, September 11, 2013

काश तू दस्तक न देता

काश तू दस्तक न देता
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मैने कहा कौन है तू ?
उसने कहा मुसाफिर हूँ
पनाह चाहिए तेरे दिल में
मैने कहा जंग लग चुकी है
अब दिल के इन दरवाज़ों में
खुलते ही नहीं किसी के लिए
उसने कहा मेरी धीमी धीमी दस्तकें
तुझे इन बंद दरवाजों को खोलने पर
मजबूर कर ही देंगे --कुछ इस तरह
खुल ही गए बरसों से बंद दिल के दरवाजे
किये इश्क के वादे सूफियाना अंदाज़
खुद से बढ़ के चाहने का दावा
ता कयामत न बदलने का भरोसा
एक कश्ती के मुसाफिर बाँट ही लेते है
आखिर अपनी तन्हाई और रतजगे --
मैने पूछा वो कौन सी चाहत है
जो तुझे यहाँ लाई मुझ तक
मुझमें तो ऐसा कुछ भी नहीं
वो बोला --सब कुछ तो है जो
मेरी चाहत है तू मेरा ख्वाब है
अब तक कौन था तेरा बोल न ??
तेरा ख्याल बस शबनम सा पाक
और मै उड़ती रही बस उडती ही रही
बिन परों के परिदे की तरह उस की ओर
और वह किसी जादूगर की तरह
हावी हो गया होशोहवास पे --
कुछ इस तरह ज्यू वो शीशा हो
अपना अक्स देखती रही उस में
वो खुश तो मै मुस्कराई
वो रंजीदा हुआ तो तल्खी से भर गई मै
और फिर एक दिन वो बिन बताये
खो गया ठीक उसी तरह जैसे आया था
बिन बुलाये ----एक यकीन था उस पे
खुद से ज्यादा -बहुत खोजा आवाज़ भी दी
ढूंढते ख़ाक छानते देखा तो खड़ा था
भीड़ के बीच मुस्कराते हुए ---कोई गम न था
उसके चेहरे पर मुझसे बिछड़ने का ---
पर मै आजतक सोचती हूँ उसने ऐसा क्यूँ किया
कभी मिले तो बस इतना कहूँगी ---उससे -
काश तूने दस्तक न दी होती --ख़ैर कोई बात नहीं
तू खुश रह मेरा क्या मै तो संभल जाउंगी
पर तू जब बिखरेगा तो ? तेरा क्या होगा

Tuesday, August 20, 2013

नुमाइश

हमारी बरबादी की नुमाइश हो रही,
किस्मत हम से रुठी और सो रही।
    लोग कहते रहे तुम पत्थर हो मगर,
    इसी पत्थर की तलब मुझ को रही।
कौन शामिल है दुख में किसी के,
रिश्ते की मिठास दिलों से खो रही।
    उम्र भर जलता रहा मु$फलिसी में,
    कम हमेशा मेरी दौलत की लौ रही।
जीवन मेरा सूना-सूना औ बंजर सा,
जि़ंदगी हंसते हुए मुझ को ढो रही।
    बहुएं घर में होकर भी देखो जरा,
    बूढ़ी अम्मा अपनी ही रोटी पो रही।
कहां करती है वैैर किसी से गंगा,
खुशी-खुशी सब के पांव धो रही।
    टूट कर बिखरे ख्वाब मेरे ‘अंशुल’,
    थकी उंगलियां फिर से सपने बो रही।

परिन्दा





वो परिन्दा दम्भ पाले, है बड़े उल्लास में।
दूसरों के पंख बांधे उड़ रहा आकाश में॥
खून के आंसू रुलायी जा रही है भावना,
हादसे ही जन्म लेते आजकल विश्वास में।
देखिए कब दिन फिरें दीपावली के, दोस्तो!
तिमिर ने कब्जा जमाया ज्योति के आवास में।
मोल हंसने का मुझे रो-रो अदा करना पड़ा,
आंसुओं की जीवनी है, दर्द के इतिहास में।
सिर्फ अपनी त्रासदी की क्या करें चर्चा यहां,
जब सदी पूरी की पूरी जा रही संत्रास में।
राजसी सुख त्यागने का तो तभी औचित्य है,
जी सके जब राम जैसी जि़ंदगी वनवास में।
है त$काज़ा वक्त का, कोई $गज़ल ऐसी कहो!
प्राण फिर से भर सके जो टूटते विश्वास में।

Tuesday, January 15, 2013

कमजोर महिला नहीं ....दुराचारी ही है....

कमजोर महिला नहीं ....दुराचारी ही है....

"औरतें उठी नहीं तो जुल्म बढ़ता जाएगा...जुल्म करने वाला ओर सीनाजोर होता जाएगा..." ये लाइनें ज्यादातर महिलाओं ने समय-समय पर सुनी होगी...परंतु वास्तव में इसको दिल से अपनाने का प्रयास बहुत कम ने ही किया होगा? अन्यथा आज इस समाज की ये हालत नहीं होती कि आए दिन कोई न कोई पुरूष रूपी नरपिचाश कभी कहीं तो कभी कहीं किसी महिला को अपनी हवस का शिकार बनाकर अपनी मर्दानगी साबित करता....। दिल्ली में 16 दिसंबर को चलती बस में लड़की के साथ गैंगरेप हुआ, मप्र में एक सप्ताह में ही अलग-अलग घटनाओं में गैंग रेप की चार वारदात हुई, जिसमें जबलपुर में 18 दिसंबर को बालिका के साथ, कटनी में 17 दिसंबर को किशोरी के साथ, रीवा में 19 दिसंबर को एक बालिका के साथ और ग्वालियर में 12 दिसंबर को एक महिला के घर में घुसकर गैंग रेप हुआ। ये सिलसिला थम नहीं रहा, इससे पहले गुवाहाटी में इसी साल 2012 की 9 जुलाई को सरेआम सड़क पर एक लड़की के कुछ लड़के कपडे़ तार-तार करते रहे और करीब 50 से ज्यादा लोग तमाशबीन बने रहे, किसी तमाशबीन ने लड़कों को रोकने की कोशिश नहीं की। ये मात्र घटनाएं नहीं है बल्कि समाज का वो कुरूप चेहरा है जो महिला को सिर्फ इस्तेमाल की वस्तु समझता है।

इस समाज की इससे बढ़ी विडम्बना और शर्मनाक बात क्या होगी कि जिस महिला के गर्भ से ये दुनिया जन्मी है, उसी के साथ दुराचार, अत्याचार करके पुरूष अपनी मर्दानगी साबित करने की कोशिश करता आ रहा है। वर्षों से यही सिलसिला चला आ रहा है, कलेण्डर बदलते रहते है परंतु घटनाएं समाप्त नहीं हो रही। जब भी अचानक कोई वीभत्स घटना सामने आती है तो देश के कोने-कोने से हर वर्ग के लोग सड़कों पर विरोध और चर्चा के लिए निकल पड़ते हैं। मीडिया को भी कुछ दिन के लिए चैनल में खबरे चलाने या अखबार में खबर छापने के लिए मैटर मिल जाता है। दोषियों को कढ़ी सजा देने के लिए चर्चा चलती है, सरकार, पुलिस, अदालत और जनप्रतिनिधियों आदि की जिम्मेदारी तय करने की बात की जाती है, नए कानून बनाने की बात शुरू हो जाती है, कानून के पहलुओं पर बहस छिड़ती है. आखिरकार हफ्ते-पंद्रह दिन में सब मामला ठंडा हो जाता है। अखबार में छपी इन्हीं खबरों पर कहीं कोई मूंगफली तो कहीं कोई समोसा खाता मिल जाएगा। आखिरकार इस सबके पीछे रह जाती है वो पीड़ित महिला या लड़की, जो जब तक जिंदा रहती है तब तक हर दिन उस नासूर घटना की पीड़ा को सहन करती है। जो लोग घटना के वक्त उसके हमदर्द बने रहने का नाटक करते है वही बाद में बार-बार पीड़ित महिला को घटना की याद दिलाकर यही एहसास कराते हैं जैसे घटना के लिए वो महिला खुद दोषी रही होगी, जैसे महिला ने ही दरिंदे पुरुषों को आमंत्रित किया होगा रेप या गैंग रेप की घटना को अंजाम देने के लिए। समाज की प्रताड़ना से ही तंग आकर कई रेप पीड़ित लड़कियां और महिलाएं आत्महत्या तक कर लेती है।
मेरे मन में हमेशा इस तरह की घटनाएं सामने आने के बाद यही विचार आता है कि आखिरकार कब तक महिलाएं इसी तरह दुराचार-अत्याचार सहन करती रहेगी, कब तक हनुमानजी की तरह उनको अपनी शक्तियों का ज्ञान नहीं होगा, क्यों और कब तक वे अपनी मदद स्वयं न करके दूसरों की तरफ सहायता के लिए हाथ बढ़ाए रहेगी? वर्षो से इस पुरुष प्रधान समाज ने हर तरह से महिला को यही एहसास कराने की कोशिश की है कि वो कमजोर है, पुरुष की मदद के बिना नहीं रह सकती। क्या वास्तव में जिस दुर्गा-काली से पुरूष शक्ति का वरदान मांगता है वो कमजोर हो सकती है? मेरा मानना है कि नहीं, बिल्कुल नहीं। जिस नारी ने पुरूष को जन्म दिया आखिरकार वो कमजोर कैसे हो सकती है। जरूरत बस इस बात की है कि महिला अपनी आत्मरक्षा के लिए किस परिस्थिति और समय पर क्या किया जाना चाहिए, इस बात का ज्ञान अपनी चेतना में सदैव रखे, तभी समाज के कलंक रूपी दरिंदों में दुराचार का विचार आने के साथ ही उसके अंजाम को सोचकर भय पैदा हो सकता है! अब लगने लगा है कि विकसित और सभ्य होने का नाटक करने वाले इस समाज में महिलाओं को अपनी रक्षा खुद ही करनी होगी, क्योंकि पुलिस, अदालत, सरकार और जनप्रतिनिधि ही किसी लायक होते तो समाज की ये स्थिति नहीं होती। अगर दरिंदे अपराधियों में कानून का भय होता तो शायद अब तक समाज से अपराध ही समाप्त हो जाते। परंतु हमारे देश में कानूनी प्रक्रिया में इतने होल हैं कि अपराधी आसानी से ससम्मान बच निकलता है और पीड़ित ही समाज में शर्मशार सा होता नजर आता है। हमारे देश का कानून अपराधी को शरण देकर पीड़ित को ही कहता है कि वो सवित करे कि उसके साथ अपराध हुआ है।
सवाल यही उठता है कि आखिरकार समाज की ये हालत कैसे हो गई, कहां हमारी चूक होती जा रही है कि स्थिति दिनोंदिन बद से बदतर होती जा रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि बच्चों का पालन-पोषण करने की हमारी प्रक्रिया बहुत गलत है। पुरूष प्रधान समाज में लड़के और लड़कियों की परवरिश बहुत अलग तरह से की जाती है जहां लड़कों को सभी तरह की छूट मिलती है, वहीं लड़कियों को शुरू से ही दब कर, तथाकथित संस्कारों के नाम पर दब्बूपने में रहने और किसी से भी झगड़ा-फसाद न करने और शान्ति से अपने घर या स्कूल में रहने की समझाइश दी जाती है, लड़की की जिंदगी का लक्ष्य यही माना जाता है कि वे किसी भी तरह से पढ़-लिखकर अपनी ससुराल चली जाए। ससुराल में किसी भी तरह की प्रताड़ना होने पर भी वे वहीं रहें क्योंकि ससुराल से लड़की की अर्थी ही उठती है। इस तरह की बातें हमारे ग्रामीण क्या शहरी परिवेश तक में सुनने को मिल जाती है, वहीं लडकों को बचपन से ये कोई नहीं सिखाता कि अपनी बहन,माँ के साथ पड़ोस की दीदी का भी वो सम्मान करे।
माना कि आज भी देश की लगभग आधी महिलाएं साक्षर-जागरूक नहीं है परंतु जो कुछ साक्षर जागरूक है उन्हें ही शुरूआत करनी होगी। अपनी बेटी का पालन-पोषण करते समय उसकी चेतना में कभी भी ये बात न आने दे कि वो किसी भी तरह से कमजोर है। उसे संस्कारी बेटी बनाने के साथ ही जरुरत पड़ने पर तत्काल दुर्गा,काली,चंडी का रूप भी धारण करना सिखाना होगा, उसे सिखाना होगा कि यदि उसके साथ कोई बदतमीजी या दुराचार करने की कोशिश करता है तो उसका जबाव कैसे दिया जा सकता है। जिस मांस के लोथड़े का पुरूष हथियार की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश करता है वही यौनांग उसकी सबसे बढ़ी कमजोरी भी है। यदि दुराचार के समय महिला की चेतना में यौनांग पर आक्रमण करने का विचार आ जाए तो दरिंदा पुरूष अपनी वाकी जिंदगी किसी महिला पर दुराचार करने लायक नहीं बचेगा। और न फिर वो महिला की श्रेणी में आएगा और न ही पुरूष की!
रेप या गैंग रेप एक ऐसा वीभत्स दुराचार है जिसमें सिर्फ महिला का शरीर आहत नहीं होता बल्कि उसका मन-मस्तिष्क सब हमेशा के लिए आहत हो जाते है। मरते दम तक वो महिला अपने साथ हुई उस घटना को शायद ही कभी भूल पाती हो। ऐसे में एक तरह से शरीर से जिंदा रहने के बाद भी ज्यादातर रेप पीड़ित महिलाएं एक तरह से मन से तो मर ही जाती है। फिर इस दुराचार को अंजाम देने वाले पुरूष को क्यों नहीं ऐसी सजा मिलनी चाहिए कि वो भी मरते दम तक उस दुराचार की घटना को याद करके दूसरे पुरूषों को कभी भी दुराचार न करने के लिए प्रेरित करे। भारत देश में कभी ऐसा कानून नहीं बन सकता कि दुराचार करने वाले पुरूष का बंध्याकरण कर दिया जाए या यौनांग काट दिया जाए। इसलिए यदि कोई दरिंदा किसी महिला के साथ रेप करे तो महिला को ही ये साहस करना चाहिए कि उस दरिंदे को कभी भी दुवारा दरिंदगी करने लायक न छोड़े।
बहुत लोगों को इस तरह के विचारों  से गहरा झटका लगेगा। लेकिन अब वास्तविकता यही है कि बेटियों-लड़कियों को एहसास दिलाना होगा कि वे कमजोर नहीं है और उन्हें अपने साथ होने वाले दुराचार का जबाव देने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए। आखिरकार सम्मानपूर्वक जिंदगी तभी हम बसर कर सकते है जब इस समाज में आधी आबादी के लिए कदम-कदम पर भय न हो, बल्कि दुराचार का विचार आने के साथ ही दरिंदगी की बीमार मानसिकता वाले पुरूष में अंजाम को सोचकर उसकी आत्मा कांप उठे! तभी लग सकता है अमानवीय दरिंदगी की घटनाओं पर अंकुश!

 

खुलकर बहने दो मुझे हवा की तरह…


खुलकर बहने दो मुझे हवा की तरह…

आज़ादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ कि नया साल रंगीन बल्बों की रंगीनियों से न निकलकर मोमबतियों की लौ से कई सवाल उठाता हुआ आया। दिल्ली से उठे तूफान ने देश को हिलाकर रख दिया। इस तूफान को दामिनी कहें या अमानत, निर्भया, वेदना या ज्योति कुछ भी कहें, वह स्वयं तो हमेशा के लिए सो गई लेकिन उसने सोये भारत को जगा दिया। सड़कों पर उतरे युवाओं ने यह सवाल भी किया कि आखिर कब तक हम औरत के सम्मान के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे? कब तक उसके लिए दोहरे मापदंड अपनाये जाते रहेंगे? वह कब तक पुरुष की मानसिकता का शिकार बनती रहेगी? दुष्कर्म की हजारों घटनाएं हर वर्ष होती हैं लेकिन वे हमारी राजनीति के नक्कारखाने में तूती की तरह खो जाती हैं। जितने दुष्कर्मों का पता चलता है, उससे कहीं ज्यादा पर मौन का ताला जड़ दिया जाता है। अब दिल्ली कांड ने नीचे से ऊपर तक सब को हिलाकर रख दिया है। यह विडम्बना ही है कि ऐसे समय जब नेतृत्वहीन लोग सड़कों पर उतरे तो सरकार में बैठे लोगों ने हतप्रभ कर देने वाली चुप्पी साध रखी थी। ऐसा पहली बार हुआ कि राजनीतिक मकसद के बगैर निहत्थे लोग सत्ता के दरवाजे पर पहुंच कर न्याय मांग रहे थे, महिलाओं के विरुद्ध बढ़ रहे अपराधों के प्रति आवाज़ उठा रहे थे। अब यदि बलात्कार और यौन-उत्पीडऩ से संबंधित कानूनों में या न्याय की प्रक्रिया में बदलाव के बारे में सोचा जा रहा है तो वह इसी दबाव का नतीजा है।
इतना ही नहीं, महिलाओं को लेकर लिखे और गाये जा रहे अश्लील गीतों पर जहां बवाल मचा हुआ है वहीं कुछ गीतकारों द्वारा लिखे गये गीत लोकप्रिय भी हो रहे हैं। इनमें से एक गीत प्रसून जोशी द्वारा लिखा गया है। विवाह के प्रति एक लड़की की आकांक्षाओं को व्यक्त करते हुए कहते हैं :-
…बाबुल इतनी अर्ज सुन लीजो,
 मुझे सुनार के घर न दीजो
 मुझे जेवर कभी न भाये ।
 मुझे राजा घर न दीजो
 मुझे राज न करना आये।
 मुझे लोहार के घर दीजो
 जो मोरी जंजीरें पिघलाये।
इसी तरह गायिका शुभा मुद्गल का गीत लोगों की ज़ुबान पर है :-
 दिल से निकली हूं रौशन दुआ की तरह
 खुलकर बहने दो मुझे हवा की तरह।
अभिनेता अमिताभ बच्चन की कविता ने भी बहुत दिलों को छुआ। लेकिन इन सब के बीच कुछ नेताओं के बयानों ने महिलाओं के प्रति अपनी बीमार मानसिकता दर्शा कर निराश भी किया। हरियाणा के एक पूर्व मंत्री अपनी एक महिला कर्मचारी की आत्महत्या के मुख्य आरोपी हैं लेकिन उनके समर्थन में उनके एक मित्र मंत्री का कहना था कि यह कोई बड़ी बात नहीं, आखिर वह उनकी नौकर ही तो थी। अब उन्हें कौन समझाये कि वह नौकर थी, कोई गुलाम नहीं। राष्ट्रपति के सांसद पुत्र ने तो यहां तक कह दिया कि मोमबत्तियां जलाकर प्रदर्शन करना एक फैशन हो गया है। ये महिलाएं सज-धज कर केवल फोटो ङ्क्षखचवाने आती हैं और उसके बाद डिस्को चली जाती हैं। उनके इस बयान पर उनकी बहन को देश से माफी मांगनी पड़ी। वैसे बहती हवा के रुख को देखते हुए उक्त नेता ने भी माफी मांगने में देरी नहीं की। कुछ नेताओं ने लड़कियों के पहरावे पर टिप्पणी की और कुछ ने उनके पुरुषों के साथ खुलकर बोलने पर। ऐसे में कोई इनसे कैसे समाज बदलने की उम्मीद कर सकता है?
एक ङ्क्षचतक ने लिखा है कि सत्ता में बैठे लोग नहीं देख पा रहे हैं कि देश की जनता के मौन क्रोध की स्थाई जमा राशि लगातार बढ़ती जा रही है। अब कोई लोहिया है, न जयप्रकाश। अब लोगों को किसी की जरूरत नहीं है। वे अपने आप उठ खड़े होते हैं। बस, ज़रा-सी ङ्क्षचगारी दिखनी चाहिए। उसे ज्वाला बनने में देर नहीं लगती। ऐसा नहीं है कि इस ज्वाला की तपन नेता महसूस नहीं कर रहे हैं। वे कर रहे हैं लेकिन मजबूर हैं। वे किसी ज्वाला में से कभी नहीं गुजरे। वे इतिहास के धक्के से ऊपर आये हैं। उन्हें जनता का धक्का ही धराशायी करेगा। कहा जाता है कि अत्याचार से बदतर अत्याचार को सहना होता है। लोग जब सहने से इनकार करने लगें तो उसे बेशक अच्छे दिनों का संकेत समझा जा सकता है। दुष्कर्म के खिलाफ सड़कों पर उतरे युवाओं में जो चेतना और संघर्ष भावना दिखी, उसमें हम ऐसे संकेत अवश्य तलाश सकते हैं।
समाज के साथ-साथ पुलिस को भी अपनी भूमिका बदलनी होगी। छेड़छाड़ के मामलों में पुलिस कर्मचारी किसी से पीछे नहीं। देश जब बदलाव के मोड़ पर है तब भी थानों में महिलाओं व लड़कियों से किये जा रहे यौन-शोषण के मामले सामने आ रहे हैं। इससे ज्यादा शर्मनाक बात और क्या हो सकती है? कानून बदलने से या नये व सख्त कानून बनाने उचित हैं लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है उन्हें ईमानदारी से लागू करना और पुलिस को महिलाओं का सम्मान कैसे किया जाये, इसका प्रशिक्षण देना। मर्दानगी की परिभाषा भी बदलनी होगी। हिंसा मर्दानगी का प्रतीक नहीं है, यह बात अब समझनी होगी। वास्तव में यह दो मानसिकताओं की लड़ाई है। आशा करनी चाहिए आने वाले वक्त में महिलाएं सड़कों पर सुरक्षित होंगी।

कब तक शिकार होंगी महिलाएं

कब तक धोखे और अत्याचार का शिकार होंगी महिलाएं


देश की राजधानी की बस में तेईस साल की युवती के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के खिलाफ उठे आन्दोलन की प्रतिक्रिया हर तरफ देखी गयी है। इस युवती के हक में और साथ साथ ही बलात्कार के तमाम मामलों में पीड़िताओं को जल्द से जल्द इन्साफ दिलाने के लिए देश के तमाम हिस्सों में भी प्रदर्शन हुए हैं। यह सरगर्मी गली मुहल्ले में भी देखी गयी है जहां लोग लड़कियों-स्त्रियों की स्थायी सुरक्षा के मुद्दे पर स्थायी समाधान किस तरह निकले इसे लेकर चिन्तित दिखे हैं। 
अक्सर बलात्कार की घटना के बाद पीड़िता को ही दोषी ठहराने की जिस रीति का बोलबाला हमारे समाज में है, उसके विपरीत इस बार यह एक सकारात्मक बात दिखी है कि लोग खुद कह रहे हैं कि सुरक्षा के लिए हम अपनी लड़कियों को घर में कैद नहीं कर सकते, न ही हर सार्वजनिक स्थल पर या लड़की जहां जाए वहां परिवारवालों की निगरानी में रख सकते हैं। आखिर लड़की होने का खामियाजा वे कब तक भुगतती रहेंगी, इसलिए सुरक्षित समाज तो उन्हें चाहिए ही।
दूसरी तरफ, बलात्कार के मामलों में पुलिसिया जांच में बरती जानेवाली सुस्ती, मुकदमों के बोझ के नाम पर ऐसे मामलों में देरी से होने वाले फैसले, आदि सभी मामलों को लेकर लोगों का आक्रोश दिखाई दिया है। जानकारों के मुताबिक इन विरोध प्रदर्शनों ने मथुरा बलात्कार काण्ड के खिलाफ हुए देशव्यापी आन्दोलन की याद ताजा की है। (1978) मालूम हो कि मथुरा नामक आदिवासी युवती के साथ पुलिस कस्टडी में हुए बलात्कार को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का जो अपमानजनक फैसला आया था, उसका जबरदस्त विरोध हुआ था और सरकार को बलात्कार सम्बन्धी कानून में बदलाव करने पड़े थे।
आज महिलाएं अधिक सुरक्षित या कम सुरक्षित !
कहां तो आज यह हकीकत है कि महिलाएं घर से बाहर शिक्षा, रोजगार या अन्य व्यवसाय के लिए अधिकाधिक तादाद में निकल रही हैं, कई राज्यों में हुकूमत संभाल रही हैं, समाज के हर क्षेत्र में अपनी अलग छाप छोड़ रही हैं ; लेकिन अगर यह पूछा जाए कि समय बीतने के साथ समूचे मुल्क का वातावरण महिलाओं के लिए अधिक सुरक्षित हो रहा है या असुरक्षित तो तथ्य दूसरी कहानी बताते हैं। 
इस घटना के दो दिन बाद ही गाजियाबाद के विजयनगर डिवाइडर पर एक लड़की गम्भीर स्थिति में सुबह 5 बजे पुलिस को मिली। लड़की को किसी वाहन से वहां फेंका गया था। उसके साथ भी बलात्कार हुआ था। उधर इसी समय सिलीगुढ़ी के बागडोरा थाना क्षेत्र में एक 18 वर्षीय लड़की को बलात्कार के बाद बलात्कारियों ने आग के हवाले कर दिया। इसी दौरान मुगलसराय, उत्तर प्रदेश में 16 वर्षीय लड़की को अपने मामा द्वारा हवस का शिकार बनाने या सुदूर दक्षिण के बंगलौर में एक जनरल स्टोर के मालिक द्वारा 14 वर्षीय बच्ची के साथ किए अत्याचार की ख़बर आयी। मणिपुर में एक अभिनेत्री को सरेआम प्रताडित करने के खिलाफ वहां की जनता किस तरह सड़कों पर है, और मामले को सम्वेदनशीलता से निपटने के बजाय सरकार ने किस तरह दमन का सहारा लिया इसके समाचार भी आए हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब महिलाओं पर अत्याचार की एक के बाद एक सामने आयी घटनाओं के चलते हरियाणा सूर्खियों में था। इन विभिन्न ख़बरों को पढ़ कर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि वातावरण कितना दहशत भरा होता जा रहा है कि कोई लड़की सड़कों पर निकलने से डरे या बाहर निकली अपनी बेटी की सुरक्षा की चिन्ता में माता पिता परेशान रहा करें।
अगर हम नवम्बर 2011 में नेशनल क्राइम्स रेकार्ड ब्यूरो द्वारा प्रकाशित आंकड़ों पर गौर करेंगे तो विचलित करनेवाली स्थिति बन सकती है। ब्यूरो के मुताबिक विगत 40 सालों में महिलाओं के खिलाफ अत्याचारों की संख्या में 800 फीसदी इजाफा हुआ है, दूसरी तरफ इस दौरान दोषसिद्धि अर्थात अपराध साबित होने की दर लगभग एक तिहाई घटी है। उदाहरण के लिए वर्ष 2010 में बलात्कार की 22,171 घटनाओं की रिपोर्ट दर्ज हुई जिसमें दोषसिद्धि दर महज 26.6 थी। स्त्रियों के साथ छेड़छाड़ (molestation) के 40,163 मामले जिसमें दोषसिद्धि दर 29.7 फीसदी तो प्रताडना (harassment) के 9,961 मामले जिनमें दोषसिद्धि दर 52 फीसदी। 
मीडिया में यह समाचार भी छपा है कि देश के विभिन्न महानगरों की 92 फीसदी महिलाएं अपने आप को असुरक्षित महसूस करती हैं। वाणिज्य एवं उद्योग मण्डल (एसोचैम) के सामाजिक विकास संस्थान की ओर से जारी रिपोर्ट से जुड़ा यह सर्वेक्षण दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, बेंगलुरू, हैदराबाद, अहमदाबाद, पुणे, देहरादून सहित कई शहरों में किया गया। रिपोर्ट में बताया गया है कि हर 40 मिनट में एक महिला का अपहरण और दुष्कर्म होता है। शहर की सड़कों पर हर घंटे एक महिला शारीरिक शोषण की शिकार होती है। हर 25 मिनट में छेड़छाड़ की घटना होती है। प्रश्न उठता है कि स्त्रियों को इस असुरक्षा से मुक्ति कैसे और कब मिलेगी ? क्या हर कोने पर पुलिस या अर्द्धसुरक्षा बल के जवान को खड़ा करके अर्थात एक सैन्यीकृत समाज के निर्माण के जरिए हमें इससे राहत मिल सकती है ? फिर इस पुलिसिया माहौल में नैतिकता के नाम पर लोगों के व्यक्तिगत अधिकारों का कितने बड़े पैमाने पर उल्लंघन होगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। 
फास्ट ट्रैक कोर्ट कब हकीकत बनेंगे !
अख़बारों का कहना है कि अचानक उठे इस आन्दोलन के चलते केन्द्र में सत्तासीन कांग्रेस पार्टी के लिए भी नयी मुश्किलें पैदा की हैं। प्रदर्शनकारियों के साथ ज्यादती के नाम पर चन्द पुलिसवालों को निलम्बित किया गया है, इस मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में ले जाने को लेकर सहमति जता दी है, सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश जे. एस. वर्मा की अध्यक्षता में बलात्कार सम्बन्धी कानूनों में बदलावों की सिफारिश के लिए एक कमेटी बिठा दी है। मगर जनता का गुस्सा अभी बरकरार है।
वैसे अत्याचार की शिकार महिलाओं को न्याय दिलाने के मामले में किसी भी अन्य सत्ताधारी पार्टी का रिकॉर्ड उजला नहीं हैं। उनके चिन्तन में भी पुरूषवादी सोच हावी दिखती है। संसद में एक विपक्षी नेत्री ने कहा कि ‘उसकी जिन्दगी मौत से भी बदतर हो चुकी है।’ यह कहते हुए उन्होंने उस पितृसत्तात्मक मूल्य प्रणाली को मजबूत किया जो बलात्कार कराती है।
यह समझने की जरूरत है कि बलात्कार यौनउपभोग का मामला नहीं होता, वह अपमान का मामला होता है, उसका मकसद बलात्कृत व्यक्ति को यह बताना होता है कि अब चूंकि उसके साथ यौन अत्याचार हुआ है, इसलिए उसकी जिन्दगी जीने लायक नहीं है। उसका मकसद होता है आप के शरीर, मन, जुबान, व्यवहार और जिस तरह आप अपनी आंखें उठाते हैं, इन सभी पर नियंत्राण करना। इसमें सम्पत्ति और शरीर को बराबर रखने की कोशिश होती है, जो पितृसत्ता की नींव होती है। जब कोई यह कहता है कि एक बलात्कृत व्यक्ति, मान लें महिला, अपवित्रा हुई है, तो उसका अर्थ होता है कि उसके साथ जो यौन हिंसा की गयी है, वह उसके व्यक्तित्व का उल्लंघन है, जो किसी की ‘सम्पत्ति’ है।
इस घटना से जो आन्दोलन खड़ा हुआ, लोग बड़ी तादाद में सड़कों पर उतरे और सरकार भी हरकत में आती दिखी तो लोग पूछ रहे हैं कि आखिर घटना घट जाने के बाद सख्ती क्यों याद आती है ? अभी तक कानूनों को सख्त बना कर पूरी तरह अमल का इन्तजाम क्यों नहीं हुआ और फास्ट ट्रैक कोर्ट को नीतिगत स्तर पर स्वीकृति मिलने के बाद भी वह क्यों नहीं बन सका। इस घटना से उपजे जनाक्रोश के दबाव में राजधानी की मुख्यमंत्री सुश्री शीला दीक्षित ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिख कर अनुरोध किया कि वे दिल्ली में फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की प्रक्रिया को तेज करे। गृहमंत्री सुशीलकुमार शिन्दे ने भी संसद के पटल पर कहा कि वह सुनिश्चित करेंगे कि उपरोक्त मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो।
महिला संगठनों तथा अन्य मानवाधिकार संगठनों से लगातार यह मांग होती रही है कि बलात्कार मामलों की फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई अपवाद नहीं बल्कि नियम बने। सरकार अगर दृढ इच्छाशक्ति दिखाए तो कैसे जल्द सुनवाई और अपराधियों को सज़ा सम्भव है, इसका उदाहरण राजस्थान में मिलता है ; जहां एक विदेशी पर्यटक के साथ हुए यौन अत्याचार के मामले में घटना के महज 15 दिन के अन्दर सारी सुनवाई पूरी कर ली गयी थी और आरोपियों को सज़ा सुनायी गयी थी, तो दूसरे एक मामले में एक सप्ताह के अन्दर बलात्कारियों के खिलाफ फैसला हो चुका था। ऐसी त्वरित कार्रवाई अन्य सभी मामलों में क्यों सम्भव नहीं है ताकि बलात्कार पीड़िता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा बन सके और वह मामले को भूल कर जिन्दगी में एक नया पन्ना पलट सके। आम तौर पर यही देखने में आता है कि चाहे न्यायालयों में लम्बित मामलों के नाम पर, मामले की जांच में पुलिस द्वारा बरती जानेवाली लापरवाही एवं विलम्ब के नाम पर फैसला आने में सालों लग जाते हैं, तब तक पीड़िता की जिन्दगी का वह दुखद अध्याय ‘खुला’ ही रहता है, उसे उससे मुक्ति नहीं मिल पाती है।
पुलिस इतनी महिलाविरोधी क्यों है ?
अभी ज्यादा दिन नहीं हु जब ‘तहलका’ पत्रिका ने एक स्टिंग आपरेशन किया था। इसका मकसद था यह जाना जाए कि दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की पुलिस महिलाओं पर अत्याचार के बारे में क्या सोचती है। छिपे कैमरे के सामने पत्रिका के रिपोर्टर से बात करते हुए दिल्ली के विभिन्न थानों, गुड़गांव, नोएडा, गाजियाबाद एवं फरीदाबाद के कुछ थानों में तैनात पुलिस अधिकारियों ने एक सुर से महिलाओं को ही उन पर होने वाले अत्याचार के लिए जिम्मेदार ठहराया था। किसी ने उनके कपड़े पहनने को लेकर आपत्ति दर्ज करायी थी तो किसी ने उनके अकेले यात्रा करने में दोष ढूंढा था। किसी को भी पुलिस की अपनी कार्यप्रणाली में कमियां नहीं मिली थीं। अपने गिरेबां में झांकने की जरूरत उन्हें महसूस नहीं हुई थी।
अगर आज़ाद भारत की राजधानी की पुलिस इस ढंग की सोच रखती है तो हम बाकी मुल्क का अन्दाजा लगा सकते हैं। 
यह भी पूछा जा रहा है कि थानों का जेण्डर बैलेन्स अर्थात वहां तैनात महिला कर्मियों के अनुपात क्यों नहीं ठीक किया गया है ताकि वहां का वातावरण अधिकाधिक महिलानुकूल अर्थात वूमेन फ्रेण्डली बन सके और लड़कियां-महिलाएं आसानी से वहां अपनी शिकायतें लेकर जा सकें। मालूम हो कि आज तक राजधानी दिल्ली की पुलिस में महिलाओं  का प्रतिशत 5 फीसदी से बढ़ नहीं सका है। 
कुछ समय पहले मुंबई पुलिस में तैनात महिला पुलिस कर्मियों के साथ सहयोगी पुरूष कर्मियों के व्यवहार पर बातचीत चली थी। मुंबई की एक तेजतर्रार महिला पुलिस अधीक्षक ने इसमें पहल ली थी। इसमें यह बात सामने आयी थी कि किस तरह इन पुरूष सहकर्मियों का व्यवहार भी उन्हें असहज बनानेवाला होता है। वे उनके सामने गाली गलौज करते हैं, महिलाओं को नीचा दिखानेवाले अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं, यहां तक कि कई लोग उनके सामने ही अपने कपड़े बदलते हैं। ऐसी पुलिस महिला अत्याचारों के मामलों को सुलझाने के बजाय किस तरह रफा दफा कर देती होगी, इसका आसानी से आकलन किया जा सकता है।
वैसे हमें यहभी नहीं भूलना चाहिए कि जनान्दोलनों को दबाने के नाम पर, लोगों के मनोबल को तोड़ने के लिए भी सरकारें पुलिस-सुरक्षा बलों के सहारे आन्दोलनरत समुदायों की स्त्रियों को सामूहिक बलात्कार का शिकार बनाती हैं। याद करें कि किस तरह उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के लिए चले आन्दोलन में भी मुजफ्फरनगर काण्ड हुआ था, जिसकी ठीक से जांच अभी तक नहीं हुई है।2002 में गुजरात में भी अल्पसंख्यक समुदाय की तमाम महिलाओं को किस तरह यौन अत्याचार का शिकार बनाया गया था, जिसमें भी किस तरह राज्य सरकार ने शह दी थी, यह बात भी तमाम रिपोर्टों में आ चुकी है।वर्ष 2004 में मणिपुर की थांगजाम मनोरमा नामक युवती को इसी तरह सुरक्षा बलों ने अत्याचार का शिकार बनाया और उसकी हत्या कर दी थी। मणिपुर की कई अग्रणी महिलाओं द्वारा सुरक्षा बलों के इस दमनात्मक रवैये के खिलाफ असम राइफल्स के मुख्यालय के सामने किए गए ऐतिहासिक प्रदर्शन की तस्वीरें सभी ने देखी होंगी। कश्मीर में 1991 में अंजाम दिए गए कुन्नान पेशोरा बलात्कार काण्ड के दोषियों को अभी तक सज़ा नहीं हुई हैं, जिसमें भी सुरक्षा बलों के जवान ही दोषी थे।
क्या बलात्कारी को फांसी देना समाधान है ?
महिलाओं पर होने वाली इस सबसे विकारग्रस्त हिंसा के समाधान के तौर पर तरह तरह के सुझाव सामने आ रहे हैं। कुछ लोगों का कहना है कि ऐसे बलात्कारियों का बन्ध्याकरण किया जाए यानि उन्हें नपुंसक बनाने के प्रावधान के लिए कानून बनाया जाए। कइयों ने बलात्कारियों के लिए मृत्युदण्ड, या फिर सार्वजनिक रूपसे फांसी की सज़ा आदि की मांग की है। 
मुद्दा यह है कि क्या पुरुषों के पौरुष खतम करने से दूसरे सम्भावित बलात्कारियों को वाकई भय होगा ? यदि ऐसा होता तो मौत की सजा वाले अपराधो पर काबू पाया गया होता। दरअसल मौजूदा कानून के तहत भी दोषियों की गिरफ्तारी और सजा की दर काफी कम है। जितनी बड़ी संख्या में अपराध होता है उतनी बढ़ी संख्या में न तो पीड़ित शिकायत के लिए पहुंचती हैं और न ही जो शिकायत करती है उन्हें  न्याय की गारन्टी होती है। इन दोनों का कारण हमारे यहां की टेढ़ी और लम्बी न्यायिक प्रक्रियाएं हैं तथा सामाजिक दबाव और लोकलाज का भय पीड़ितों को शिकायत करने से रोकता है। 
अतएव पहला मुद्दा तो यह है कि बलात्कार जैसे अपराध के लिये पूरी न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लायी जाए तथा जांच के नाम पर पीड़ितों को फिरसे परेशान करने वाले प्रावधानों को समाप्त किया जाए। मालूम हो कि अबतक बलात्कार की पुष्टि के लिए मेड़िकल टेस्ट में ‘फिंगर टेस्ट’ का इस्तेमाल होता है। पिछले दिनों इस प्रकार की जांच प्रक्रियाओं का 
काफी विरोध हुआ था। इसके अलावा बलात्कार के जांच के सभी मामलों में डीएनए जांच को अनिवार्य बनाया जाए। 
दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा यह विचार करने का है कि किसी भी सभ्य होते समाज में सजा के मध्ययुगीन तरीकों को कैसे सही ठहराया जा सकता है। अपराधी का अपराध निश्चित ही छोटा नहीं है लेकिन सभ्य समाज जब सोच-समझ और विचार कर के सजा देगा तो वह सख्त तो हो सकता है लेकिन क्रूर और बर्बर नहीं। पहले के समय में कई प्रकार के अपराधों के लिए हाथपैर , नाक, कान काट दिये जाते थे या इसी प्रकार क्रूरता की जाती थी ताकि दहशत फैलाकर अपराध पर काबू पाया जा सके। अब तो कई देशों ने अपने यहां मौत की सजा का प्रावधान भी समाव्त कर दिया है। इसका अर्थ कतई यह नहीं है वहां अपराध करने की छूट है।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि बलात्कारियों का अंग भंग करना या उसे मार ड़ालना समाधान नहीं है, दरअसल उम्रकैद की अवधि बढ़ायी जानी चाहिए। ऐसे अपराधियों को जेल के अन्दर भी बैठाकर खिलाने के बजाय उनसे श्रम कराया जाना चाहिये। सबसे प्रथम उनकी न्यूनतम सज़ा को सुनिश्चित किया जाना चाहिए। 
दूसरा महत्वपुर्ण मुद्दा यह है कि अपराध के बचाव का जिसमें अपराधी प्रवृत्ति या व्यवहार का जन्म ही न हो । यानि लोग अधिकाधिक सभ्य ,संवेदनशील तथा दूसरों का सम्मान करनेवाले बने। हर व्यक्ति की अधिकारों के प्रति यदि चेतना बढ़ती है तथा महिला समुदाय को बराबरी मिलती और वह सशक्त होती है तो उसके खिलाफ अपराध कम होंगे। पूरे समाज में चेतना और जागरूकता के साथ ही न्यायिक सक्रियता और सख्ती तथा चुस्त पुलिस प्रशासन समस्या से बचाव एवम् निराकरण के उपाय हो सकते हैं। 
तीसरे, बलात्कार की घटना के बाद अगर राजनेता या पुलिस अधिकारी पीड़िताओं को ही दोषी ठहराने वाले बयान देते हैं - जैसा कि इस घटना के बाद भी कुछ नेताओं ने दिया है - तो ऐसे बयान देने वालों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
दिन को लेगें आजादी और रात को लेंगे आजादी
तय बात है कि अगर सभी सार्वजनिक दायरों में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा मिले तो बड़ी संख्या में उनकी उपस्थिति पुरूषवर्चस्ववाले वातावरण को बदल सकती है तथा अपराधी तत्वों पर अंकुश लगाने के लिए माहौल जल्द बन सकता है। सार्वजनिक दायरा महिलाओं के लिए अधिकाधिक सुरक्षित कैसे बने, इसको लेकर तमाम सवाल शासन प्रशासन से पूछे जा सकते हैं क्योंकि कानून एवं व्यवस्था की जिम्मेदारी वही सम्भालने का दावा करते हैं। उदाहरण के लिए सड़कों की संरचना या उनमें लाइट की व्यवस्था किस तरह स्त्रियों की मोबिलिटी को बाधित कर सकती है, इसका भी हम अन्दाजा लगा सकते हैं। 
सवाल सिर्फ सरकार को कटघरे में रखने का नहीं है, ऐसी घटनाएं जब जब सामने आती हैं तो हम साथ साथ समाज और घर-आंगन को भी कटघरे में खड़ा पाते हैं, जहां यह अपराधी प्रवृत्तियां जनमती हैं या पलती-बढ़ती हैं। इसके पहले के सभी बलात्कारी किसी पेड़ से नहीं टपके थे। आखिर इन सबने यह कहां से सीखा कि मौज मस्ती के लिए किसी के साथ जोर जबरदस्ती की जा सकती है, जैसे कि राजधानी की घटना के आरोपियों ने पुलिस के सामने स्वीकार किया कि वे मस्ती के मूड में थे। उन्होंने क्यों नहीं दूसरों का सम्मान करना सीखा और उनकी नज़रों में वह लड़की उपभोग की वस्तु बन गयी ? कानून, थाने या अदालत की भूमिका तो अपराध की घटना घटने के बाद बनती है लेकिन उससे पहले ऐसी मानसिकता तैयार करने के लिए जिम्मेदार पूरा समाज है। याद रहे कि घर के अन्दर के पालन पोषण से लेकर शैक्षणिक संस्थानों की सीख एवं फिल्में टीवी आदि वह सब किसी इन्सान के व्यक्तित्व को तैयार करता है। जब कोई एक गुट या समूह एक साथ किसी आपराधिक घटना में शामिल होता है तब उनमें से कोई एक भी प्रतिरोध क्यों नहीं करता कि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। निश्चित ही किसी दूसरे को कोई नुकसान नहीं पहुंचे तथा खुद को काबू में रखना उनकी अपनी जिम्मेदारी है यह सीख परिवार ठीक से नहीं दे रहा है। स्पष्ट है कि समाज युवाओं को समाज में सृजनात्मक योगदान के बारे में प्रेरित नहीं कर रहा है।
आइये, आज जब स्त्रियों पर बढ़ते अत्याचारों को लेकर समूचे समाज में नयी जागरूकता आयी है, सिर्फ युवतियां या महिलाएं ही नहीं बल्कि युवक भी सड़कों पर बड़ी तादाद में उतरे हैं, तब हम यह संकल्प लें कि हम इस संघर्ष को यही नहीं छोड़ देंगे। पीड़िता को न्याय सुनिश्चित करने के साथ साथ हम ऐसे तमाम मामलों में इन्साफ की गारंटी करेंगे और अपनी आवाज़ यह कहते हुए बुलन्द करेंगे कि ‘यौन अत्याचार अब कभी नहीं’ !
 

पूरी दुनिया में जब यह माना जा रहा हो कि मौजूदा दौर में महिलाएं तेजी से तरक्की कर रही हैं, वह अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही हैं, हर क्षेत्र में वह पुरुषों के संग कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं, तभी देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी घटनाएं भी सामने आ रही हैं जो न केवल इन दावों पर सवालिया निशान लगा देती हैं, बल्कि सच्चाई की एक ऐसी तस्वीर पेश करती है जो हर आदमी के रोंगटे खड़े कर देती है। यह घटनाएं मौजूदा समाज में महिलाओं की हालत के बारे में सोचने केलिए विवश कर देती हैं। यह घटनाएं बताती हैं कि कैसे हर कदम पर महिलाएं धोखे और अत्याचार का शिकार होती हैं। कैसे उनके अस्तित्व से खिलवाड़ किया जा रहा है और उनकी अस्मिता को रौंदा जा रहा है?
पहली घटना राजस्थान के दौसा जिले से है। यहां तीन निजी अस्पतालों ने मोटी कमाई के चक्कर में पिछले वर्ष २२६ महिलाओं का गर्भाशय ही निकाल दिया। एक गैरसरकारी संगठन अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत की ओर से दाखिल आरटीआई आवेदन में यह खुलासा हुआ है। पंचायत के महासचिव दुर्गाप्रसाद ने दावा किया है कि अस्पतालों ने इसके लिए हर मरीज से नकदी भी वसूली। ये अस्पताल सरकारी स्कीम ‘जननी सुरक्षा योजना’ के तहत प्रसव कराने के लिए मान्यता प्राप्त हैं। जिला प्रशासन ने जांच के लिए दौसा की सीएमओ ओपी मीणा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है। इतनी बड़ी संख्या में गर्भाशय तब निकाले गए जब इनकी जरूरत नहीं थी। अस्पताल की ओर से मरीजों को डराया गया कि अगर गर्भाशय नहीं निकाला गया तो मरीज के शरीर में इनफेक्शन फैलने का खतरा है।
दूसरी घटना, गाजियाबाद जिले केमोदीनगर इलाके के सीकरी खुर्द में हुई। यहां शनिवार को एक व्यक्ति ने इज्जत की खातिर एमबीए की पढ़ाई कर रही अपनी बेटी का गला घोटने के बाद शव को फांसी के फंदे पर लटका दिया और खुद कोतवाली में पहुंचकर समर्पण कर दिया। पिता में बेटी के प्रति नफरत की वजह यह थी कि उसके दूसरे संप्रदाय के युवक से प्रेम संबंध थे। आरोपी के बेटे ने पिता पर बहन की हत्या करने का आरोप लगाते हुए घटना की रिपोर्ट दर्ज कराई है।
तीसरी घटना, बाराबंकी जिले के हैदरगढ़ थाना क्षेत्र के दतौली गांव की है। यहां भूमि विवाद के चलते बदचलनी का आरोप लगाकर जेठ व चचेरे ससुर ने एक महिला को पेड़ से बांधकर निर्ममता से पिटाई की। मां को बचाने आयी १४ वर्षीय पुत्री की भी जमकर धुनाई कर दी। तमाशबीन बने ग्रामीणों की मौजूदगी में करीब तीन घंटे तक अत्याचार का सिलसिला चला। बाद में पुलिस ने महिला को दबंगों के चंगुल से मुक्त कराया और दो लोगों को गिरफ्तार किया।
चौथी घटना, अलीगढ़ की है। यहां-समस्या दो समाधान लो-जैसे कार्ड, पंफलेट छपवाकर एक कथित तांत्रिक ने दर्जनभर से अधिक महिलाओं के लाखों के जेवर ठग लिए। बन्नादेवी के रघुवीरपुरी (मसूदाबाद बस स्टैंड वाली गली) स्थित मार्केट में हुई इस घटना के बाद महिलाओं ने हंगामा शुरू किया तो पुलिस ने तांत्रिक की रिसेप्शनिस्ट को हिरासत में ले लिया है।
( फोटो गूगल सर्च से साभार )

रिश्तो की अहमियत


एक प्रेमी और प्रेमिका शादी के पहले आपस में बहुत प्यार करते थे।
थोड़ी नोक झोक उनमें होती रहती थी।
फिर प्यार से मान जाते थे वे।
शादी के बाद तो उनमें हर छोटी- मोटी बात को लेकर नोक- झोक होती थी।

कई कई दिन तक उनमें बातचित बन्द रहती थी।
आज दोनो की सालगिरह थी।लेकिन लड़की ने जानबूझ कर नहीं बताया।
वो देखना चाहती थी की उसके पति को याद है की नहीं।

पर आज पति सुबह ही उठा और नहा धो कर जल्दी ही बाहर चला गया।
बिवि रुआँसी हो गई।
थोड़ी देर बाद दरवाजे पर घण्टी बजी,वो दरवाजा खोली।

देखा पति गुलदस्ते और उपहारो के साथ एनिवर्सरि सरप्राईज लाया था।
उसने उपहार लेकर पति को गले से लगा लिया फिर पति घर के अन्दर चला गया।
तभी बिवि के मोबाईल पे पुलिस वाले का कॉल आया की,
उसके पति की लाश मिलि है।उसके पति का एक्सिडेंट हो चूका है।

वो सोचने लगी की उसका पति अभी तो गिफ्ट देकर अन्दर ही गया है।
फिर उसे वो बात याद आ गई जो उसने सुना था की मरने के बाद अन्तिम इच्छा पूरी करने के लिये इंसान कीआत्मा एक बार आती है।

वो दहाड़ मार के रोते हुये कमरे में गई।
सच में उसका पति वहाँ पर नहिं था।
वो रोने लगी उसे अपने किये गये सारे नोक झोंक याद आने लगे।

वो चिल्लाने लगी प्लीज कमबैक,प्लीज कमबैक। मैं कभी नहीं लड़ुँगी।
तभी बाथरूम से उसका पति निकला और रोने का कारण पूछा।

बिवि उसके सीने से लिपट गई और रोने लगी फिर सारी बात बताई।

तब पति ने बताया की आज सुबह उसका पर्स चोरी हो गया था।

।।ऐसे ही जिन्दगी में कई
अहम रिश्ते और दोस्ती होते है, जिनका महत्व हमें तब समझ आता है।जब वो नहीं होते।

प्यार बाँटिये नफरत कहाँ तक ढ़ो पायेंगे।

रिश्तो की अहमियत को समझिये।।।।