Tuesday, October 15, 2013

नवरात्रों का अभिन्न हिस्सा है कन्यापूजन

नवरात्र में शक्ति स्वरूपा मां भगवती के आराधना का तो महत्व है हीए इस दौरान कन्या पूजन का महत्व भी कम नहीं होता है। धर्मग्रन्थों में कुमारी पूजा को नवरात्र व्रत का अनिवार्य अंग कहा गया है। क्योंकि एक निश्चित उम्र की लड़की को यौवन प्राप्त करने से पहले सबसे शुभ, सबसे स्पष्ट दिमाग और स्पष्ट आत्मावाला व्यक्ति माना जाता है, कहते हैं शक्ति के आराधकों के लिए कन्याएं साक्षात माता के समान होती हैं। इनकी आराधना करने से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और मनोकामना पूर्ण करती हैं।
पूजी जाने वाली कन्याओं को देवी के शक्ति स्वरूप का प्रतीक बताया गया है। नवरात्र में माता के नौ रूपों क्रमश शैलपुत्री,ब्रह्माचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी व सिद्धदात्री देवी की पूजा का विधान है।
नवरात्र में 2 से 10 वर्ष की कन्याओं के पूजन का विधान है। कहते हैं कुमारी पूजन से दुख दरिद्र दूर होता है व शत्रु का शमन होता है। इससे धन, आयु व बल की वृद्धि होती है। त्रिमूर्ति की पूजा से धर्मए अर्थ व काम की सिद्धि मिलती है। इसी तरह कल्याणी की पूजा करने से विद्याए विजय व राजसुख की प्राप्ति होती है। चंडिका की पूजा से ऐश्वर्य व धन की पूर्ति होती है। किसी को मोहित करनेए संग्राम में विजय पाने और दुख दारिद्र को हटाने के लिए शांभवी तथा कठिन कार्य को सिद्ध करने के लिए दुर्गा के रूप की पूजा की जाती है। सुभद्रा का पूजन करने से मनोकामना पूरी होती है तथा रोहिणी की पूजा से व्यक्ति निरोग रहता है।
नवरात्र में अगर उम्र के हिसाब से कन्याएं मिलें तो हर दिन उनके पूजन का विधान है। अन्यथा अष्टमी के दिन कन्याओं को आसन पर बैठाकर मां भगवती के नामों से पृथक.पृथक उनकी पूजा करनी चाहिए। कन्याओं के पूजन और उनकी आरती उतारने के बाद उनको भोजन कराते हुए वस्त्र आदि भेंट कर उन्हें विदा करना चाहिए।
नवरात्र में किया गया पूजा.पाठ व आराधना कभी निष्फल नहीं होता। अपितु श्रद्धालुओं को उसका फल निश्चित रूप से मिलता है।

नवरात्र : शक्ति आराधना का पर्व

नवरात्र : शक्ति आराधना का पर्व

Posted On October - 6 - 2013
शक्ति उपासना का इतिहास बहुत प्राचीन है। आदिकाल से मानव ने सृष्टि की नियामिका शक्ति को स्वीकार किया है। आदिग्रन्थ वेद इसके प्रमाण हैं। आद्यग्रन्थ ऋग्वेद में जहां एक ओर परमतत्व के पुरुष रूप की उपासना की गई है, वहीं दूसरी ओर उसके स्त्रीलिंग की उपासना भी मिलती है। शक्ति उपासना का मूल आधार आद्यग्रन्थ ऋग्वेद की द्यावा पृथ्वी की कल्पना है, जिसमें पृथ्वी स्त्री मानी गई है और आकाश पुरुष। इन दोनों के तादात्म्य की चर्चा ऋग्वेद में अनेक बार की गई है। युग्म रूप में इनका अनेक सूत्रों में आह्वान हुआ है, जिनमें इन्हें माता-पिता कहा गया है। आर्यों के एक वर्ग ने जहां पितृसत्ता की खोज और उपासना की है, वहीं दूसरे वर्ग ने मातृसत्ता की खोज करके उसकी उपासना एवं महत्व का मार्ग निर्दिष्ट किया है। मनु ने सहस्र पिताओं की तुलना में एक माता के गौरव को अधिक स्वीकार किया है। माता के प्रति आर्य जाति की इस आस्था ने ही शक्ति पूजा को जन्म दिया। इसी भावना से प्रेरित होकर ऋग्वैदिक काल में देवताओं की पूजा के साथ-साथ देवियों की पूजा के संकेत भी मिलते हैं। ऋग्वेद में पृथ्वी, रात्रि, वाक्, सरस्वती, पुरंध्रि, धिष्णा, इडा, वृहद्विवा, राका, सिनीवाली, पृश्नि, सरण्यू, इन्द्राणी, वरुणानी, अग्नायी, रुद्राणी, अश्विनी और श्रद्धा आदि देवियों का उल्लेख है। ऋग्वेद के दशम् मण्डल के एक सूक्त में वाक् यानी वाणी की देवी के रूप में स्तुति की गई है। इसमें देवी की महिमा का बहुत ही उदात्त वर्णन है। तद्नुसार वाक्, ही समस्त देव शक्तियों की मूल है। धर्मसूत्रों में भी शक्ति तत्व को स्वीकार किया गया है। धर्मसूत्रों के समान ही गृह्यसूत्रों में शिवपत्नी का उल्लेख है। गृह्यसूत्रों में शिवमूर्ति की उपासना के साथ-साथ देवी पूजन की विधियां बतायी गई हैं। इसमें प्रथम बार उनको दुर्गा नाम दिया गया है। रामायण में देवी के दुर्गा नाम का उल्लेख है। एक स्थल पर उन्हें रुद्राणी कहा गया है। अनेक स्थलों पर उन्हें अन्य देवताओं से भी उत्कृष्ट माना गया है। देवतागण भी उनके सामने आंख उठाने का साहस तक नहीं कर सकते।
शक्ति का पूर्ण विकसित रूप शाक्त पुराणों में मिलता है। देवी उपपुराण प्राचीन एवं प्रमुखतम शाक्त उपपुराणों में से एक है। इसमें मुख्यत: देवी का चित्रण युद्धरत यानी रक्षा करने वाली देवी के रूप में हुआ है। ‘कालिका उप पुराण’ भी शाक्त पुराण है, जिसमें कामाख्या को प्रधान देवी माना गया है। तद्नुसार कामाख्या ही प्रधान देवी है जो वास्तव में विभिन्न कार्यों के सम्पादन के लिए नाना रूप धारण करती है। आदि शक्ति के रूप में देवी के स्वरूप का वर्णन मार्कण्डेय पुराणोक्त दुर्गा सप्तशती में मिलता है। श्रीमद् देवीभागवत् पुराण शाक्तमत का स्वतंत्र पुराण है जिसमें देवी को विश्व की नियामिका अधिष्ठात्री चैतन्यमयी शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। ‘सर्वश्वाल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्’ यह श्लोकाद्र्ध ही देवी भागवत् का मूल वचन है। इसके द्वारा ही देवी भागवत् में वर्णित आद्याशक्ति के वास्तविक स्वरूप के दर्शन होते हैं। स्पष्ट है कि देवी उपासना बहुत प्राचीन है जिसके उदभव सूत्र आद्यग्रन्थ ऋग्वेद के मंत्रों में उपलब्ध होते हैं। शक्ति उपासना का बीजारोपण वेदों से ही हो चुका था। वैदिक युग से प्रारम्भ होकर प्रत्येक युग में शक्ति उपासना प्रचलित थी। शक्तिवाद की यह परम्परा अविछिन्न है।
शक्ति की आराधना का, वंदना का मुख्य स्त्रोत वैदिक साहित्य है। यजुर्वेद में दुर्गा अम्बिका के नाम से तो पुराणों में और महाकाव्यों में शक्ति के रूप में जानी गई है। शक्ति को स्त्री रूपा माना गया है और देवताओं की सहायिका मानी गई है। इसके अतिरिक्त इन्हें जगतजननी, सृष्टिकर्ता आदि की भी उपमा दी गई है। दुर्गा सप्तशती में पहली बार दुर्गा के शक्ति रूप की उपासना की गई है, जिसमें नारीत्व की महिमा का वर्णन है। दुर्गा सप्तशती के अनुसार दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था। दुर्गा का आविर्भाव विष्णु तथा रुद्र के क्रोध से हुआ। इस देवी के शरीर में सभी देवताओं का वास है। बौद्धसिद्धों तथा तांत्रिकों की देवी उग्रतारा, प्रज्ञापरामिता तथा महामुद्रा में शक्ति के रूप में देवी दुर्गा की ही कल्पना है। शक्ति की उपासना हमारी भारतीय संस्कृति का मूल है। भारतीय संस्कृति में उपासना की जो पद्धति है, वैसी किसी भी अन्य धर्म में उपलब्ध नहीं है। भारतीय संस्कृति आदि संस्कृति है। दुनिया के अधिकतर देश जब अज्ञानता के अंधकार में भटक रहे थे, तब इसी संस्कृति ने सभ्यता और संस्कृति के दीप जलाए। इस संस्कृति में शक्ति उपासना का सर्वाधिक महत्व है। शक्ति विनाशकारी ताकतों के नाश के लिए बेहद जरूरी है। नवरात्रि का यह पर्व विशेषकर आदि शक्ति की पूजा के लिए है, जिसे मां दुर्गा के नाम से पुकारा जाता है। दुर्गा शक्ति की अधिष्ठात्री है। इसे नकारा नहीं जा सकता। दुर्गा का अर्थ है राक्षसों का विनाश करने वाली अर्थात बुराई को मिटाने वाली शक्ति। दुर्गा की दस शक्तिशाली भुजायें, सिंह की सवारी और असुर की छाती को भेदता उनका भाला उस शक्ति का ही तो प्रतीक है। दुर्गा के विभिन्न रूप हैं और इनके लिए 108 नामों का उल्लेख है। इनमें कात्यायनी, चंडिका, अम्बा, गौरी, कपालिनी, चामुण्डा, वैष्णो देवी, काली, उमा, भवानी, छिन्नमस्तिका, सुन्दरी और कमला आदि प्रमुख हैं।
दुर्गा के इन चरित्रों का मनन करने के बाद हमें यही शिक्षा मिलती है कि सोई हुई शक्ति को बिना जाग्रत किए किसी भी महत्वपूर्ण काम में सफलता प्राप्ति असंभव है। हमेशा सक्रिय नहीं रहने से हमारी इंद्रियां मलिन होकर ‘मधु कैटभ’ जैसी आत्मघाती पाशविक शक्तियों को जन्म देती हैं, जिनका संहार भगवती महादेवी द्वारा प्रदत्त बुद्घि शक्ति के बिना असंभव है। दुर्गा का चरित्र यह बताता है कि अपनी शक्ति चाहे कितनी भी प्रबल क्यों न हो, अकेले वह कुछ भी नहीं कर सकती। अगर ऐसी ही अनेक शक्तियां एक साथ मिलकर आसुरी शक्तियों का, प्रवृत्तियों का विरोध करें तो विजय अवश्यंभावी है। वर्तमान में दुर्गा पूजा काफी हद तक सर्वत्र प्रासंगिक है। चैत्र तथा शरद माह के नौ दिन जो कि नवरात्र कहे जाते हैं, शक्ति उपासना के विशिष्ट पर्व माने जाते हैं। सच तो यह है कि नवरात्र दुर्गा मां के शक्ति स्वरूप का आराधना पर्व है । यह सर्वत्र बड़े धूमधाम एवं उत्साह के साथ मनाये जाते हैं।

देवी उपासना का विधान

नवरात्र का समय परिवर्तन का ऐसा समय होता है जिसमें शरीर-मन की बढ़ी संवेदनशीलता को मर्यादित जीवन और साधना द्वारा हम आत्म विकास में नियोजित कर सकते हैं। नवरात्रि के नौ दिन जीवन साधने की कला के दिन हैं ताकि जीवन सार्थक हो सके। नवरात्रि में भगवती दुर्गा की विधिवत् पूजा करने वाले व्यक्ति की कामनाएं शीघ्र पूरी होती हैं। वर्ष भर में दो प्रमुख गुप्त और दो प्रकट नवरात्रि का उल्लेख है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी पर्यंत।
आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से नवमी पर्यंत।
आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी पर्यंत।
माघ शुक्ल प्रतिपदा से नवमी पर्यंत।
इनमें से चैत्र व आश्विन के महीने की नवरात्र की विशेष महिमा बताई गई है। नवरात्र का रात्रि से कोई संम्बंध नहीं है। नवरात्रि से नौ तिथियों में भगवती का समन्वित उपासनापरक अर्थ ग्रहण किया जाता है। उपासना हेतु प्रतिपदा के दिन मंडप आदि तैयार कर स्थापना करनी चाहिए। दक्षिणमुखी शुभत्व, पूर्वाभिमुखी विजय व पश्चिमाभिमुखी प्रतिमा कामना सिद्धि वाली होती है। जबकि उत्तराभिमुखी प्रतिमा से शुभत्व का नाश होता है। अत: उत्तराभिमुखी प्रतिमा कभी न रखें। प्रतिमा के अभाव में ‘ओउम् ऐं ह्वीं क्लीं चामुण्डाये विच्चे’ इस मंत्र को शास्त्र विहित धातु में खुदवाकर यंत्र बनाएं तथा उसी की विधिवत् पूजा करें।
भगवती दुर्गा की पूजा वैदिक काल से चली आ रही है। विभिन्न युगों में विविध रूपों को धारण करने वाली भगवती दुर्गा के अवतरण का मुख्य उद्देश्य समाज व राष्ट्र को अव्यवस्थित करने वाली आसुरी शक्तियों का दमन कर प्रजा के हृदय में शम, दम, दया, शुचिता, धैर्य, विद्या, बुद्धि, क्षमा और अक्रोध रूपी धर्म को धारण कराना है। वे प्रसन्न हों तो समस्त दुर्गतियां टल जाती हैं। यद्यपि भारत में अनेक देवताओं की उपासना की जाती है किंतु कलियुग में भगवती दुर्गा या चंडी कहें व श्रीगणेश की उपासना शीघ्र फलदायी होने के कारण बहुधा प्रचलित है। कहा भी गया है-’कलौ चण्डी विनायकौ।’ कलिकाल के आरंभ से पहले ,द्वापर के अंत में ही भगवती योगमाया दुष्ट कंस के हाथोंसे छूटकर भगवान की सहायता हेतु और कलिकाल में भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए विविध रूपों व नामों को धारण कर स्थान-स्थान पर विराजित हो गईं-श्रीमद्भागवत् के खण्ड 10/4/13 में वर्णित है-
इति प्रभाष्य तं देवी माया भगवती भुवि।
बहुनामानिकेतेषु बहुनामा बभूव ह।।
तात्पर्य यह कि एक दुर्गा के पूजन से ही सभी देवताओं के पूजन की सिद्धि तथा मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। कारण वही परमात्म शक्ति है। देवी उपनिषद में देवताओं ने अतुल तेजस्विनी भगवती को देखकर आश्चर्य से पूछा कि -’का असि त्वं’ अर्थात तुम कौन हो! तब देवी ने कहा कि—अहं   ब्रह्म स्वरूपिणी। विज्ञानाविज्ञानेेहम्। मैं ही ब्रह्म स्वरूपिणी हूं, मैं ही विज्ञान और अविज्ञान हूं। कूर्म पुराण के अनुसार जिसके द्वारा यह सृष्टि चक्र निरंतर चलता है, संपूर्ण विश्व जिसके प्रकाश से प्रकाशित हो रहा है, वह एक जगन्मयी भगवती दुर्गा ही हैं। यही दुर्गा विविध नामों और रूपों में भक्तों का कल्याण करने व उन पर अनुग्रह करने के लिए साक्षात् विराजित हैं।

महालया का महत्व

महालया का तात्पर्य है मां कात्यायनी की आगमन भेरी! हमारे यहां आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या का दुर्गा पूजा में विशेष महत्व है। दुर्गा पूजा की पूर्व संध्या पर महालया की परंपरा है। इस दिन दुर्गा सप्तशती पर एक विशेष आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर देवी की आराधना, दुर्गा पूजन की मूलकथा का मंचन किया जाता है और भक्ति गीत गाये जाते हैं। बांसुरी और संगीत की स्वरलहरी के मध्य देवी की आराधना के स्वर स्वप्नमय वातावरण में छाते चले जाते हैं । ‘या देवी सर्वभूतेषु’ की मधुरिम आवाज से समूचे वातावरण को ओतप्रोत करती देवी की मंगल आगमन भेरी महालया भक्तजनों के मनप्राण में एक अजीब सा स्पंदन जगा जाती है। सात सौ श्लोकों वाले ग्रंथ दुर्गा सप्तशती का महालया के रूप में पाठ समस्तजनों को मंत्रमुग्ध कर देता है। इसमें न केवल देवी की, बल्कि जीवन को उत्प्रेरित और संचालित करने वाले सभी तत्वों की आराधना है। देवी दुर्गा एकता और ब्रह्मशक्ति की प्रतीक हैं। वह स्वयं कहती हैं—मैं वेद भी हूं, अवेद भी। मैं पैदा भी हुई हूं और नहीं भी हुई हूं। देवी की आराधना करते हुए देवता उससे रूप, यश और शत्रु पर विजय की याचना करते हैं—रूपं देहि, जय देहि, यशो देहि द्विषो जहि।
विभिन्न देवताओं की सम्मिलित शक्ति से दुर्गा का पैदा होना दरअसल हमें इस बात की प्रेरणा देता है कि समवेत शक्ति से बड़ी से बड़ी आसुरी शक्ति अथवा संकट पर विजय पायी जा सकती है। देवी की स्तुति में ऋषिगण और देवता कहते हैं कि—या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:।। अर्थात जो देवी सभी प्राणियों में दया के रूप में विद्यमान है, हम उन्हें बारम्बार नमस्कार करते हैं। इसी प्रकार क्षमा, क्षुधा, निद्रा, मातृ और कर्मरूपी देवी की उपासना की गई है। सच तो यह है कि महालया और कुछ नहीं, बल्कि हमें इस बात का संदेश देता है कि हम अपने सद्गुणों को जगायें। यही सच्चे देवत्व की उपासना है और यही महालया का संदेश भी।

बदल रही है रामलीला

बदल रही है रामलीला

आधुनिकता का असर हमारे सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर भी नजर आने लगा है। यही वजह है कि हाइटेक होती आज की जनरेशन के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हाईटेक होने लगे हैं । बरसों से पारंपरिक रूप से मंचित होने वाली ‘रामलीला’ पर इसका प्रभाव दिखाई पड़ने लगा है। जहां नौ दिनों तक मंचित होने वाली ‘रामलीला’ के प्रति आज के युवाओं का रुझान कम हुआ है वहीं लोगों को आकर्षित करने के लिए चाहे दिल्ली हो या लखनऊ, हर जगह नये उपाय अपनाये जा रहे हैं
व्यस्त जीवनशैली ने उत्तर भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में भगवान राम के चरित्र को रंगमंच पर उतारने की परंपरा को काफी हद तक बदलकर रख दिया है। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक धरोहर ‘रामलीला’ के प्रति लोगों की रुचि लगातार कम होती जा रही है। यही वजह है कि ‘रामलीला‘ को आज न तो पर्याप्त संख्या में दर्शक मिल रहे हैं और न कलाकार। दिल्ली स्थित लाल किला के पास रामलीला का मंचन करने वाली धार्मिंक लीला कमेटी के अध्यक्ष वेद प्रकाश गोयल के अनुसार, व्यस्त जीवनशैली के कारण लोग परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं। ‘रामलीला‘ की परंपरा भी इससे अछूती नहीं रह गई है। एक जमाना था जब गली-मोहल्ले में भी ‘रामलीला‘ मंचन होता था। लेकिन आज हालत इतर हैं। आज इसे न तो पर्याप्त संख्या में दर्शक मिल रहे हैं और न कलाकार। राम कला मंदिर के प्रमुख आनंद खजूरिया कहते हैं, ‘आज रामलीला के मंचन के लिए कलाकार भी बमुश्किल मिल रहे हैं। पहले ‘रामलीला‘ के दौरान किसी भी पात्र को निभाने के लिए कई कलाकार लाइन में लगे रहते थे लेकिन आज केवल मुख्य पात्र निभाने के लिए ही वे आगे आते है।‘
विश्व धरोहर
 टीवी, इंटरनेट और पढ़ाई के बोझ के कारण आज के बच्चों तथा युवाओं में रामलीला के प्रति रुझान काफी कम हो गया है। गौरतलब है कि यूनेस्को ने रामलीला की लोकप्रियता और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए वर्ष 2005 में इसे विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया था। यूनेस्को के अनुसार, दशहरा के मौके पर गांवों, कस्बों और शहरों में आयोजित की जाने वाली ‘रामलीला’ असत्य पर सत्य की विजय को प्रदर्शित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
बदला स्वरूप
 â€˜राम लछिमन जानकी जै बोलो हनुमान की., हे राम तुम्हारे कहने से मैं लंकापुरी को जाता हूं, आने-जाने में देर नहीं सीता का पता लगाता हूं..।‘
धनुष बाण की टंकार और मंच पर पैर पटकते हुंकारों से भरे फिजा में गूंजते सं वादों के बीच रामलीला प्रस्तुतियों ने जोर पकड़ लिया है। रामलीला समितियों के किरदार बदल रहे हैं। मंच पंडाल को हर बार पिछली बार से अलग दिखाने की तैयारियां भी जारी हैं।
पटकथा और संवाद में बदलाव
रामलीला के स्वरूप में भी बदलाव दिखने लगा है। केशव के कठिन छंदों, चौपाइयों, दोहों से तैयार मौसमगंज रामलीला की पटकथा इस बार दर्शकों को नए कलेवर में दिख रही है। श्री मौसमगंज रामलीला एवं नाट्य समिति डालीगंज के संरक्षक तेज प्रकाश गुप्ता ने बताया कि 134 बरसों से चली आ रही रामलीला की मूल स्क्रिप्ट दशकों से ही चली आ रही है। करीब 90-100 साल पहले उसमें कुछ बदलाव किया गया था। फिर भी उसमें मौजूद छंद, सोरठे, दोहे आदि काफी कुछ आज आम दर्शकों की समझ में नहीं आते। पिछले कुछ बरसों से इसमें बदलाव महसूस किया जा रहा था। इसे देखकर इस बार रिहर्सल के साथ-साथ स्क्रिप्ट में भी बदलाव जारी है। आज रामलीला के संवाद आम भाषा में ढाले जा रहे हैं। कुछ शायराना अंदाज, कुछ तुकबंदी भी जोड़ी जा रही है।
डिजिटल हुई रामलीला

 अब तक दर्शक टीवी व मंच पर ही रामलीला का मंचन देखते थे, लेकिन अब रुपहले परदे पर भी रामलीला को उतारा गया है। हर बार की तरह इस बार भी दिल्ली के मंगोलपुरी के तालाब मंदिर, सिनेमा मैदान में दशर्क हाइटेक रामलीला का आनंद ले रहे हैं। वत्स क्लब रामलीला कमेटी ने इस बार खास इंतजाम किये हैं। क्लब की ओर से रामलीला का पूरा मंचन 70 एमएम के परदे पर उतारा गया है। इसे प्रोजेक्टर के माध्यम से दिखाया जा रहा है। रोज नए-नए हाइटेक साउंड के साथ दर्शक 70एमएम के परदे पर रामलीला का मंचन देख रहे हैं।

मोबाइल पर लाइव

सीता हरण, जटायु वध या फिर लंका दहन, मंच पर होने वाली रामलीला के इन दृश्यों को अब आप घर बैठे लाइव देख सकेंगे। लखनऊ की सबसे ऐतिहासिक ऐशबाग रामलीला समिति इस बार रामलीला का इंटरनेट पर सीधा प्रसारण करने जा रही है, जिसे स्मार्ट फोन पर भी लाइव देखा जा सकेगा। 3जी यूजर समिति की वेबसाइट पर जाकर लिंक कर इस रामलीला का सीधा प्रसारण देख सकते हैं। समिति के अध्यक्ष हरिश्चंद्र अग्रवाल ने बताया कि समिति प्रयास कर रही थी कि दर्शक पर्दा उठने से लेकर अंतिम दृश्य तक का सीधा प्रसारण इंटरनेट और मोबाइल पर देख सकें। काफी हद तक हम इसमें सफल भी हुए हैं। नई पीढ़ी को रामलीला से जोड़ने की हमारी कोशिश रंग भी ला रही है। बच्चों को मोबाइल पर लाइव रामलीला देखना रास आ रहा है।

कैसे बची रहे शक्तिस्वरूपा कन्या

कैसे बची रहे शक्तिस्वरूपा कन्या

नवरात्र में हमारे देश में कन्या को देवी स्वरूपा मानकर पूजा जाता है लेकिन उसका यह स्वरूप सदैव बरकरार नहीं रहता। तभी तो कन्या भ्रूणहत्याओं के आंकड़े दिल दहलाने वाले हैं। हर साल लगभग 8 लाख अजन्मी कन्याओं का कोख में ही कत्ल कर दिया जाता है। जो इस दुनिया में आ जाती हैं, उनमें से न जाने कितनी यौन शोषण और उत्पीड़न का शिकार होती हैं, तो कितनों को ही दहेज की बलिवेदी पर जिंदा जला दिया जाता है
डॉ. श्रीगोपाल नारसन भारतीय समाज में कन्या देवी के रूप में पूजनीय है। कन्या को शक्ति स्वरूपा भी कहा गया है। इस शक्ति स्वरूपा की पूजाकर ही नवरात्रों में पुण्य प्राप्ति का विधान है। घर-घर में देवी के उपासक उपवास रख कर नवदुर्गा की साधना करते हैं और कन्याओं को देवी रूप में मानकर उन्हें जिमाते हैं। आस्था स्वरूप कन्याओं के पैर भी पूजे जाते हैं। परन्तु, क्या वास्तव में हम कन्याओं के प्रति संवेदनशील हैं? क्या हम चाहते हैं कि हमारे घर में पुत्र से पहले पुत्री पैदा हो? शायद नहीं, जबकि इतिहास में भी रानी लक्ष्मीबाई समेत अनेक ऐसी वीरांगनाएं हु ई हैं, जिन्होंने राष्ट्रभक्ति और बहादुरी का इतिहास रचा। वहीं कन्या रूप से बड़ी होकर नारी बनने वाली एक मां, एक बहन, एक पत्नी को ममता की मूरत बताते हुए उसे कोमल हृदय कहा जाता है। मौजूदा समय में नारी देश में शीर्षतम पदों पर विराजमान होने से उसका सम्मान भी लगातार बढ़ रहा है। श्रीमती प्रतिभा देवी पाटिल देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति की कुर्सी को सुशोभित कर चुकी हैं तो यूपीए अध्यक्ष की कमान कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी के हाथों में है। लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर मीरा कुमार विराजमान हैं। पश्चिम बंगाल का जिम्मा ममता बनर्जी संभाल रही हैं तो देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की कमान मायावती कई बार संभाल चुकी हैं।
कानून नहीं हो रहे कारगर इतना सब होने पर भी इस कन्या की भ्रूण में ही हत्या और बड़ी होने पर उसका शोषण व उत्पीड़न के कारण नारी पर संकट के बादल मंडराए हुए हैं। उसे या तो जन्म लेने से पहले ही भ्रूणहत्या कर समाप्त किया जा रहा है या फिर उसे दहेज की बलिवेदी पर जिंदा जला दिया जाता है। हद तो यह है कि नारी को जन्म लेने से पहले ही मार डालने और अगर जिंदा बच जाए तो विवाह होने पर दहेज के लिए प्रताड़ित करने में अधिकतर नारियों की ही भूमिका रहती है। हालांकि कहीं-कहीं पुरुष भी पति, देवर, जेठ और ससुर के रूप में नारी को प्रताड़ित करने से बाज नहीं आते। हालांकि दहेज की समस्या से निपटने के लिए 1961 में ही कानून बन गया था। वहीं दहेज हत्या के लिए 1986 में कानून लाकर कड़े दंड की व्यवस्था की गई तो भी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्डस ब्यूरो के मुताबिक, देश में 2011 में 8,618 दहेज हत्याएं हुईं। साथ ही, दहेज उत्पीड़न के 6,619 मामले सामने आए, जबकि वास्तविकता इससे कहीं ज्यादा है। लेकिन सजा सिर्फ 35.8 प्रतिशत को ही हो पाई। दूसरी ओर, देश में कन्या भ्रूणहत्याओं के आंकड़े दिल दहलाने वाले हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 8 लाख अजन्मी कन्याओं का कोख में ही कत्ल कर दिया जाता है। तभी तो सरकारी आंकड़ों में भी 2001 से 2005 तक प्रतिदिन 1,900 तक कन्या भ्रूणहत्याएं हुई हैं, जिनकी वर्षवार गणना की जाए तो एक साल में 682 हजार कन्या भ्रूणहत्या होने को सरकार ने भी माना है जबकि हकीकत इससे कहीं ज्यादा भयावह हो सकती है, क्योंकि निजी अस्पतालों और घरों में की जा रही कन्या भ्रूणहत्याएं इससे कहीं ज्यादा हैं। इसी कारण पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या लगातार घट रही है। वैश्विक स्तर पर भले ही पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का प्रतिशत ज्यादा कम न हो परन्तु भारत में यह प्रतिशत लगातार बढ़ता जा रहा है, जो चिन्ता का विषय है। स्त्री-पुरुष का बिगड़ता संतुलन सन 1901 में 1,000 पुरुषों के सापेक्ष महिलाओं की संख्या 972 थी, जबकि 1991 में घटकर 927 तक घट गई। 2011 में यह संख्या प्रति 1,000 पुरुष के सापेक्ष थोड़ी बढ़ने के बाद 940 पर पहुंच गई है। केन्द्र शासित दमन और दीव में तो प्रति एक हजार पुरुष पर महिलाओं की संख्या 618 तक आ पहुंची है। इसी तरह हरियाणा में यह संख्या 877 है जो समाज में स्त्री-पुरुषों के बीच विसंगति का प्रमाण है। लेकिन मौजूदा समय में यह आंकड़ा पुरुषों की संख्या में काफी नीचे है जिससे समाज में स्त्री-पुरुष का संतुलन बिगड़ गया है। संतुलन बनाए रखने के लिए स्त्री-पुरुष दोनों को लगभग बराबरी पर आना होगा। गांव की अपेक्षा शहरों में महिलाओं पर संकट कुछ ज्यादा हावी है, तभी तो गांवों में प्रति 1,000 पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या 939 है, जबकि शहरों में प्रति 1,000 पुरुषों के सापेक्ष महिला संख्या घटकर 894 पर पहुंच गई है, जो नारी को दुनिया में न आने देने की नाजायज कोशिश का प्रमाण है। इसी तरह महिला पर अत्याचार के मामले भी लगातार बढ़ रहे हैं। पिछले एक साल के भीतर महिलाओं के खिलाफ अत्याचारों में 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। पिछले एक साल के दौरान देशभर में महिला उत्पीड़न की 81 हजार 344 घटनाएं प्रकाश में आई हैं। महिला उत्पीड़न की सबसे ज्यादा 22 प्रतिशत से ज्यादा घटनाएं त्रिपुरा में हुईं, वहीं पश्चिम बंगाल में महिला शोषण के 16 हजार 112 मामले सामने आए हैं, जिससे इन राज्यों की हकीकत का पता चलता है। उत्तर प्रदेश में भी महिला उत्पीड़न की घटनाएं बड़े राज्यों में सबसे ज्यादा हैं। सन 2008 की अपेक्षा 2009 में महिला उत्पीड़न की वारदातों में 4 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोत्तरी हुई, वहीं 2009 से 2010 में 10 प्रतिशत से ज्यादा का महिला उत्पीड़न ग्राफ बढ़ना गंभीर चिंता का विषय है। इसी प्रकार घरेलू हिंसा कानून के 2005 में पारित होने और 26 अक्टूबर, 2011 में लागू होने बाद 2011 में ही रिकॉर्ड रूप 99,135 हिंसा के घरेलू मामले दर्ज किये गए। अमेरिका में हुए अध्ययन के मुताबिक, भारत में 35 प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी रूप में घरेलू हिंसा की शिकार हैं। आंकड़े यह भी बताते हैं कि देश में हर साल 150 लाख लड़कियां पैदा होती हैं जिनमें से एक चौथाई 15 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते जान से हाथ धो बैठती हैं यानी कन्याओं की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। कन्या को को ख में सुरक्षित रखने के लिए अनेक कानून भी बनाए गए। फिर भी अल्ट्रासाउंड के माध्यम से गर्भ में ही कन्या की पहचान कर उसकी हत्या की जाने लगी। हद तो यह है कि इस घृणित कार्य में जान बचाने का संकल्प लेने वाले डॉक्टर भी भागीदार बन गए। इसीलिए सरकार को डॉक्टरों पर भी अंकुश लगाने के लिए कानून लाना पड़ा। लेकिन पिछले 18 बरसों में आज तक कन्या भ्रूणहत्या के लिए एक सौ आरोपी भी दोषसिद्ध नहीं हो पाए। ऐसे में, सजा मिलना तो दूर की बात है। यही कारण है कि कन्या भ्रूणहत्या का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है और कन्या भ्रूणहत्या का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। हमें नवरात्र पर कन्या भ्रूणहत्या रोकने का संकल्प लेना चाहिए। देवी की असली पूजा कन्या भ्रूणहत्या रोकना है और कन्या के जन्म लेने पर मुंह लटकाने की नहीं, खुश होने की आवश्यकता है जिससे वास्तव में आधी दुनिया संख्या अपने नाम को सार्थक कर सके।
गांव की अपेक्षा शहरों में महिलाओं पर संकट कुछ ज्यादा हावी है, तभी तो गांवों में प्रति 1,000 पुरुष के सापेक्ष महिलाओं की संख्या 939 है, जबकि शहरों में प्रति 1,000 पुरुषों की तुलना में महिलाओं की आबादी 894 पर पहुंच गई है

दशहरे पर दूर करें दानवी वृत्तियां

दशहरे पर दूर करें दानवी वृत्तियां
आज का मानव तो दानव नहीं है लेकिन उसकी वृत्तियां दानवी हैं। आज हम दिशाहीन हो रहे हैं। अत: विजय पर्व पर मानवता को सशक्त करने का प्रयास करें। मात्र दशहरा मना लेने भर से असत्य पर सत्य की विजय नहीं होती। कर्मो में आदर्श और मर्यादाएं लाने से असत्य पर सत्य की विजय होती है। युग बदल चुका है। वह त्रेता था, यह कलयुग है। रावण असुर था, उसकी वृत्तियां भी आसुरी थीं लेकिन उसने भी अपने जमीर से गिरकर कोई कार्य नहीं किया। दानवता पर मानवता की विजय भारतवासी विजयादशमी के रूप में मनाते हैं। असुरी प्रवृत्ति के सर्वनाश का संदेशवाहक पर्व दशहरा युगों-युगों से इसीलिए मनाया जाता है ताकि मनुष्य के अंतर्मन में तामसी प्रवृत्तियां समाहित न हो सकें..

आज का मानव तो दानव नहीं है लेकिन उसकी वृत्तियां दानवी हैं। आज हम दिशाहीन हो रहे हैं। अत: विजय पर्व पर मानवता को सशक्त करने का प्रयास करें। मात्र दशहरा मना लेने भर से असत्य पर सत्य की विजय नहीं होती। कर्मो में आदर्श और मर्यादाएं लाने से असत्य पर सत्य की विजय होती है। युग बदल चुका है। वह त्रेता था, यह कलयुग है। रावण असुर था, उसकी वृत्तियां भी आसुरी थीं लेकिन उसने भी अपने जमीर से गिरकर कोई कार्य नहीं किया। दानवता पर मानवता की विजय भारतवासी विजयादशमी के रूप में मनाते हैं। असुरी प्रवृत्ति के सर्वनाश का संदेशवाहक पर्व दशहरा युगों-युगों से इसीलिए मनाया जाता है ताकि मनुष्य के अंतर्मन में तामसी प्रवृत्तियां समाहित न हो सकें..रावण तो स्वयं विद्वान था, राजनीति का कुशल पंडित था। उसे अमरत्व प्राप्त था। वह जीवन से ऊब चुका था। उसकी इच्छा मृत्युलोक त्यागने की थी। वह मोक्ष पाना चाहता था। स्वर्ग तक जाने के लिए उसके मन में सोने की सीढ़ी बनाने की भी योजना थी। उसने माता सीता का हरण अवश्य किया था लेकिन इसके पीछे उसका विचार कितना उज्‍जवल थाए इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने एक बार मंदोदरी से कहा था कि



दसी पड़े तो पड़न दे मन में राखो धीर।

ता कारण सीता हरी कि मुक्ति देत रघुवीर।

अर्थात मेरे दस के दस शीश भी कट जाएं तो कटने दे, मन में थोड़ा धीरज रख। मैंने सीता का हरण इसलिए किया है कि मुझे रघुवीर के हाथों मुक्ति मिले। रावण की विद्वता का अंदाज भी इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने लक्ष्मण को रावण से राजनीति की शिक्षा लेने हेतु भेजा था। युग बदल चुका है। वह त्रेता था, यह कलयुग है। रावण असुर था, उसकी वृत्तियां भी असुरी थीं लेकिन उसने भी अपने जमीर से गिरकर कोई कार्य नहीं किया। दानवता पर मानवता की विजय भारतवासी विजयादशमी के रूप में मनाते हैं। असुरी प्रवृत्ति के सर्वनाश का संदेशवाहक पर्व दशहरा युगों-युगों से इसीलिए मनाया जाता है ताकि मनुष्य के अंतर्मन में तामसी प्रवृत्तियां समाहित न हो सकें। वर्तमान परिदृश्य में रावण के पुतले के आकार के समानांतर दुष्टता में भी अभिवृद्धि हो रही है।



पापों की काली छाया भारत की धरती पर गहराती जा रही है। मानव मन दूषित होता जा रहा है। स्वार्थ-लोलुपता ने परमार्थ के प्रकांड लक्ष्य को धूमिल कर दिया है। अहंकार असंख्य विकार लेकर लोगों के दिलों में दस्तक दे रहा है। आचरण की मर्यादाएं विलोपित हो चुकी हैं। असंयमित व्यवहार आम लोगों की जीवनचर्या का हिस्सा है। वासनाओं की मद में लिप्त मनुष्य आदर्शो की लक्ष्मण रेखा लांघ चुका है। ऐसी विकट परिस्थितियों में जब दानवी वृत्तियां स्वयं मनुष्य में ही आकर समाहित हो गई हैं, हमें ऐसी वृत्तियों का समूल नाश करना होगा। आज का मानव तो दानव नहीं है लेकिन उसकी वृत्तियां दानवी हैं। आज हम दिशाहीन हो रहे हैं। अत: विजय पर्व पर मानवता को सशक्त करने का प्रयास करें। मात्र दशहरा मना लेने भर से असत्य पर सत्य की विजय नहीं होती। कर्मो में आदर्श और मर्यादाएं लाने से असत्य पर सत्य की विजय होती है।

संकल्प दशहरा

 बुराई पर विजय का संकल्प दशहरा

दशहरा सिर्फ एक पर्व का नाम नहीं है बल्कि शक्ति की पूजा सहित खुद के अंदर के ‘रावण’ को जलाने और इसका संदेश देने का पर्व है। यह सुरक्षात्मक सुशासन और साधनविहीन युद्ध में लड़ाई जीतने का प्रतीक भी है। इसमें बुराई पर अच्छाई की जीत की कहानी समाहित है। यही संदेश रामायण से लेकर दुर्गा सप्तशती तक में निहित है
डॉ. मोहन चंद शारदीय नवरात्र में नौ दिनों तक दुर्गा की नौ शक्तियों की पूजा-आराधना के बाद अश्विन शुक्ल दशमी को दशहरा या विजयादशमी का पर्व पूरे देश में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। विजयादशमी को ही अपराजिता पूजा का पर्व भी कहा जाता है। नवदुर्गाओं की माता अपराजिता संपूर्ण ब्रrांड की शक्तिदायिनी और ऊर्जा प्रदान करने वाली देवी हैं। देव-दानव से युद्ध में नवदुर्गाओं ने जब दानवों के संपूर्ण वंश को निमरूल कर दिया तब दुर्गा अपनी आदिशक्ति अपराजिता को पूजने के लिए शमी की घास लेकर हिमालय में अंतध्र्यान हो गई। बाद में आर्यावर्त के राजाओं ने विजय पर्व के रूप में विजयादशमी के आयोजन की परंपरा प्रारम्भ की। भगवान रामचंद्र ने नौ दिनों तक शक्ति की समाराधना करने के बाद इस दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया था। इसलिए कालांतर में विजयेच्छु राजा इस दिन शस्त्र-अस्त्र की पूजा करते थे तथा विशाल शोभा यात्रा निकालकर सीमा उल्लंघन का अनुष्ठान भी करते थे। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, अश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय ‘विजय’
नामक शुभ काल होता है जिसके कारण इस समय किए गए सभी कार्य सिद्धिदायक होते हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से इंद्र ने दशहरा के दिन असुरों पर विजय प्राप्त की। नवरात्र अयोध्यावंशी भारत जनों का मुख्य पर्व है। ‘तैत्तिरीय आरण्यक’ के अनुसार, नवरात्र में अष्टमी के दिन अयोध्या दुर्ग के रक्षक वीर योद्धा, ‘उत्तिष्ठत जाग्रत अगिमिच्छवं भारत:’ के विजय-घोष से शस्त्र पूजा करते थे। इतिहास साक्षी है कि जब भी देश पर आक्रमण हुआ, अयोध्या दुर्ग के रक्षक भारतवंशी वीरों ने देश रक्षा का अभूतपूर्व इतिहास कायम किया। तभी से नवरात्र के अवसर पर दुर्ग रक्षिका दुर्गा की पूजा का प्रचलन शुरू हुआ। महाभारत का युद्ध भी विजयादशमी के दिन प्रारंभ हुआ। राजा विक्रमादित्य ने इसी दिन देवी हरसिद्धि की पूजा की थी। छत्रपति शिवाजी ने भी विजयादशमी के दिन देवी दुर्गा को प्रसन्न करके तलवार धारण की थी। तभी से मराठा वीर सैनिक शत्रु विजय का अभियान दशहरे के दिन से प्रारंभ करते हैं।
शस्त्र-पूजा की परंपरा 

 इधर, भारतीय सेना में आज भी शस्त्र-पूजा का पर्व अत्यंत हर्षोल्लास से मनाया जाता है। भारतीय सेना में जाट, राजपूत, मराठा, कुमाऊं और गोरखा रेजीमेंट में विजयादशमी के अवसर पर शस्त्र-पूजा की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है। महाराष्ट्र में शस्त्र-पूजा ‘सीलांगण’ एवं ‘अहेरिया’
नाम से लोकप्रिय है। इस अवसर पर मराठे एवं राजपूत सैनिक दुर्गा एवं राम की मूर्तियों को पालकी में रखकर सीमा का उल्लंघन करते थे। सन 1434 में जब बूंदी एवं चित्ताैड़गढ़ के राजपरिवार इस तरह सीमा उल्लंघन कर रहे थे, उसी दिन हांडा सेनाओं ने सिसौदियों पर आक्रमण कर दिया जिसमें राणा कुंभा को अपनी जान गंवानी पड़ी। दरअसल, विजयादशमी का पर्व राष्ट्ररक्षा में तत्पर क्षत्रिय वीरों के शस्त्र परीक्षण और सैन्य प्रशिक्षण का राष्ट्रीय अभियान है। इसे राज्य की सीमाओं के उल्लंघन की गतिविधियों से इसलिए जोड़ा गया ताकि देश की सीमाओं की शत्रु सेनाओं की घुसपैठ से रक्षा की जा सके। भारत के प्राचीन राष्ट्रवादी चिंतकों का यह मानना था कि आततायियों और आतंक फैलाने वाले तत्वों का सफाया किए बिना कोई भी राष्ट्र आत्मरक्षा हेतु समर्थ नहीं हो सकता- ‘शस्त्रोण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्रार्चचा प्रवर्तते।’ प्राचीन काल में रघु आदि चक्रवर्ती राजाओं ने जितने भी दिग्विजय अभियान चलाए, उनका मुख्य उद्देश्य न तो साम्राज्यवादी लिप्सा थी और न ही विजितों की संस्कृति को नष्ट करना प्रयोजन था। चक्रवर्ती होने का अर्थ यही था। चक्र के आरों की भांति प्रत्येक राज्य को अपनी स्वतंत्रता- प्रभुता कायम रखते हुए एक केंद्रीय सत्ता द्वारा पराक्रम पूर्ण सुरक्षात्मक सुशासन प्रदान करना। विजयादशमी के अवसर पर राम-रावण युद्ध की हजारों वर्ष पुरानी घटना आज भी प्रासंगिक और प्रेरणादायी इसलिए है क्योंकि राम ने लंका पर अपना सैन्य अभियान अयोध्या की राजकीय सेना के बल पर नहीं चलाया बल्कि रावण के अत्याचार और आतंक से उत्पीड़ित वनवासी ऋषि-मुनियों, शबरी आदि भील जातियों एवं वानर-भालू आदि जनजातियों को संगठित करते हुए अपने लंका अभियान को सफल बनाया। राम-रावण युद्ध साधनविहीन जनसामान्य द्वारा अष्टांग राज्य से सम्पन्न एक शक्तिशाली राष्ट्र के विरुद्ध किया गया सैन्य अभियान भी है जिसमें वानर-भालू आदि अप्रशिक्षित सैनिकों ने अपने दृढ़-संकल्प और कठोर परिश्रम से लंका की प्रशिक्षित तथा साधन-संपन्न सेना को पराजित किया। जारी पेज 3
जलायें अपने भीतर का रावण

मर्यादा पुरुषोतम श्रीराम का चरित्र एक आदर्श पुरुष का चरित्र है। इसलिए सभी इस चरित्र और रामायण के अन्य पात्रों से शिक्षा लें, इसलिए नवरात्रों में जगह-जगह रामलीलाओं का मंचन किया जाता है। राजा दशरथ को एक आदर्श पिता के रूप में, भगवान राम को मर्यादा पुरुषोतम और रघुकुल रीत रूपी वचनों का पालन करने के रूप में, भाई लक्ष्मण को बड़े भाई की भक्ति के रूप में, भाई भरत को बड़े भाई के प्रति समर्पण के रूप में, उर्मिला को पति विरह के रूप में, कौशल्या को आदर्श मां के रूप में, कैकेयी को अवसर का फायदा उठाने के रूप में जहां हमेशा याद किया जाता है, वहीं हनुमान की राम भक्ति, विभीषण की सन्मार्ग शक्ति, जटायु की पराक्रम सेवा और सुग्रीव की राम सहायता हमेशा अमर रहेगी। सच पूछिए तो रामायण एक आदर्श जीवन जीने का सन्मार्ग सिखाती है। तभी तो हम बार-बार रामायण पढ़ते हैं और दशहरे से पहले रामलीला का मंचन कर राम काल से प्रेरणा लेकर राम राज्य की कल्पना को साकार करने की कोशिश करते हैं। रावण को उसके पुतले के प्रतीक रूप में इस बार फिर जलाया जाएगा। यह रावण सदियों से जलता आ रहा है। फिर भी रावण हर साल जलने के लिए फिर सामने आ जाता है। दरअसल, जितने रावण हम जलाते हैं, उससे ज्यादा पैदा हो जाते हैं। रावण का तो फिर भी चरित्र था, जिसने अपनी बहन सूर्पनखा के अपमान का बदला लेने के लिए भगवान राम की अर्धांगिनी सीता माता का अपहरण किया लेकिन उनकी पवित्रता को आंच नहीं आने दी और उन्हें अशोक वाटिका में ससम्मान रखा। परन्तु आज के रावणों का कोई चरित्र नहीं रह गया है। इसलिए आज के रावणों का अंत होना वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती है। रामलीला मंचन के बाद दशहरे पर भले ही हम हर साल रावण जलाकर बुराई का अंत करने की पहल करते हैं परंतु यथार्थ में रावण का अंत पुतलों को जलाने से नहीं होता। असली रावण तो हम सबके अंदर विकारों के रूप में विराजमान है। काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार रूपी विकारों को जलाकर हम पावन बन जाएं तो भगवान राम की पूजा सार्थक हो जाएगी और रावण रूपी विकारों का भी अंत हो जाएगा। इतना ही नहीं, रावण रूप में जो देश के गद्दार हैं, रावण रूप में जो देश की शांति का हरण करने वाले आतंकी हैं, रावण रूप में जो व्यभिचारी हैं, रावण रूप में जो भ्रष्टाचारी है, रावण रूप में जो हिंसावादी हैं, रावण रूप में जो घोटालेबाज हैं, रावण रूप में जो साम्प्रदायिकता का जहर समाज में घोल रहे हैं, रावण रूप में जो विकास के दुश्मन हैं, उनका अंत करने से ही रामराज्य की परिकल्पना साकार हो सकती है। भगवान राम किसी एक के नहीं बल्कि उन सभी के हैं, जो भगवान राम को अपना आदर्श मानकर उनके आदशरे पर चलते हैं। भगवान राम अयोध्या के ऐसे महान राजा हुए, जिनके राज्य में कोई भी दुखी नहीं था। चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का क्यों न हो, उनके राज्य में सभी सुखी एवं प्रसन्न थे। तभी तो रामराज्य को अब तक का सबसे अच्छा राज्य कहा जाता है। रामराज्य की परिकल्पना साकार करने के लिए हम सबको अपने-अपने विकारों को जलाना होगा, ठीक उसी रावण की तरह जिसे बुराई के रूप में हम वर्षो से जलाते आ रहे हैं।

लंका विजय के बाद भी राम ने न तो रावण के राज्य को अपने साम्राज्य में मिलाया और न ही किसी द्वेष भावना से लंका की राक्षसी संस्कृति को मिटाने का प्रयास किया। ‘रामचरितमानस’ के राम-रावण युद्ध के प्रसंग की चौपाई ‘रावनु रथी बिरथ रघुबीरा’ से प्रेरणा लेकर गांधीजी ने आधुनिक युग में रामकथा का एक नया इतिहास ही रच डाला। त्रेता युग के राम को आदर्श मानते हुए गांधीजी ने शस्त्रहीन अहिंसक क्रांति द्वारा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के अत्याचार से उत्पीड़ित भारत को मुक्त कराने की एक अद्भुत मिसाल प्रस्तुत की। पर चिंता का विषय है कि उनके रामराज्य का सपना अधूरा ही है।
हजार सिरों वाला रावण नवरात्र के अवसर पर पू रे देश में रामलीलाओं के मंचन का मुख्य उद्देश्य होता है- असत्य पर सत्य की विजय, अधर्म पर धर्म की जय तथा सदाचार से भ्रष्टाचार का निमरूलन का संदेश देना। रामलीला मैदानों में रावण, मेघनाद, कुंभकरण के विशालकाय पुतले बनाए जाते हैं तथा ‘विजयादशमी’ के दिन उनका दहन किया जाता है। रावण के पुतले तो हर वर्ष जला दिए जाते हैं किन्तु अंधविकासवादी आसुरी तेवरों के परिणामस्वरूप आज रावण दस सिरों वाला नहीं रहा, बल्कि हजार सिरों वाला हो चुका है। भ्रष्टाचार, दुराचार, बलात्कार, दुर्बल उत्पीड़न, पर्या वरण प्रदूषण, ग्लोबल वार्मि ग, आतंकवाद आदि की निरंतर बढ़ोत्तरी के कारण ‘सहस्रस्कंध’ रावण अपना विराट रूप धारण करके जन सामान्य को संत्रस्त कर रहा है। किंतु विडम्बना यह है कि आज हमारे पास ऐसा कोई राम नहीं, जो इस ‘सहस्रस्कंध’ रावण का संहार कर सके। इसलिए विजय यात्रा का अभियान समाप्त नहीं हो जाता बल्कि शारदीय नवरात्रों पर एक ऐसी बिरथ राम की तलाश जारी रहती है, जो धनबल तथा बाहुबल की माया शक्ति से जकड़ी हुई सीतारूपी लोकतंत्र का अपहरण करने वाले वर्तमान भ्रष्टाचार रूपी रावण से मुक्ति दिला सके। सदैव जारी है यह संघर्ष विजयादशमी के अवसर पर आज भी रावण के अत्याचारों से संत्रस्त जनता उस शमीवृक्ष की पूजा करना चाहती है, जिसके अंदर ‘सहस्रस्कंध’
रावणों को भस्म करने की अग्नि प्रज्ज्वलित है। जनता इस दिन उस नीलकंठ पक्षी में शिव के दर्शन करना चाहती है जो आतंकवाद रूपी रावण द्वारा फैलाए गए विष का पान कर सकता है। भारतीय परंपरा में राम-रावण युद्ध का यह संघर्ष सदैव चलायमान रहता है।
रावण को उसके पुतले के प्रतीक रूप में इस बार फिर जलाया जाएगा। यह रावण सदियों से जलता आ रहा है, फिर भी रावण हर साल जलने के लिए सामने आ जाता है

अगली बार कहां से लाओगे कन्याएं


 
 अगली बार कहां से लाओगे कन्याएं

नौवरात्र के अंतिम दिन सभी मां दुर्गा के नौ स्वरूप के रूप में नौ कन्याओं को भोज कराते हैं। इस दिन ऐसी कन्याओं की व्यस्तता देखते ही बनती है, कोई कहीं भाग रही होती हैं तो किसी का पेट भर गया होता है तो कोई घर से निकलने को तैयार नहीं होतीं। फिर भी आप दौड़ भाग कर कैसे भी करके नौ कन्याओं को जब ले आते हैं तो खुद को किसी जंग के विजेता से कम नहीं समझते। समङो भी क्यूं ना, इतनी मशक्कत करके दूसरे के घर पर घंटो पहरा देने के बाद जो आपको यह सफलता हाथ लगी है। खैर इस बार तो आपने जैसे-तैसे करके नौ देवियों को भोज करा दिया पर क्या अगली बार आपको यह सफलता मिल पायेगी? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस तरह समाज में महिलाओं या लड़कियों के साथ व्यवहार हो रहा है और उनका अनुपात कम हो रहा है,उससे ऐसी आशंका तो उत्पन्न होती ही हैं। नौ देवियों के साथ होने वाले नौ मुख्य र्दुव्‍यवहारों से हम आपको अवगत कराते हैं- कन्या भ्रूण हत्या, रेप, दहेज के लिए हत्या, छेड़छाड़, ईल वीड़ियो द्वारा बदनाम करना, तेजाब से हमला, परिवार का दबाब, कुपोषण, घरेलू हिंसा। ये वे नौ तरीके हैं जिनसे किसी भी स्त्री को आज के युग में प्रताड़ित किया जा रहा है। कन्या भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराध की बात की जाय तो रिपोर्ट बताती है कि कैसे अवैध रूप से चल रहे कुछ डॉक्टरों के क्लीनिक्स पर लिंग परिक्षण रोक कानून के बाद भी धड़ल्ले से गर्भ में पल रहे बच्चे के बारे में जानकारी दी जाती है। इसका असर यह होता है कि अधिकतर मामलों में यदि पेट में बेटी पल रही होती है तो उसे गर्भ में ही मार दिया जाता है जो कि कानूनी तौर पर अपराध है और आईपीसी की धारा 315 में इसके लिए सजा का भी प्रावधान है फिर भी लोग इस तरह के घोर अमानवीय कृत्य करते हैं। सर्वे में पाया गया कि इस तरह के कार्यों को करने वाले ज्यादातर लोग पढ़े-लिखे, सभ्य घरों से ताल्लुक रखने वाले हैं। कुछ ने एक बेहद हास्यापद एवं दुर्भाग्य पूर्ण बयान भी दिए कि बेटी का समाज द्वारा शोषण हो इससे अच्छा उसको जन्म ही न दिया जाये। यह बयान निंदा योग्य है पर कहीं न कहीं ये हमारे समाज की बुराई को भी उजागर कर रहा है। इस संदर्भ में एक बात याद आती है कि एक बार एक स्त्री एक स्त्रीरोग विशेषज्ञ के पास गई और बोली, मैं गर्भवती हूं, मेरे गर्भ में एक बच्ची है । मैं पहले से एक बेटी की मां हूं और मैं किसी भी दशा में दो बेटियां नहीं चाहती। इस गर्भ को गिराने में मेरी मदद करें। डाक्टर बोला, हम एक काम करते हैं आप दो बेटियां नहीं चाहती न तो पहली बेटी को मार देते हैं, जिससे आप इस अजन्मी बच्ची को जन्म दे सके। वैसे भी हमको एक बच्ची को मारना है तो पहली वाली को ही मार देते हैं न। तो वह स्त्री तुरंत बोली न न डाक्टर!!! हत्या करना गुनाह है पाप है और वैसे भी मैं अपनी बेटी को बहुत चाहती हूं। उसको खरोंच भी आती है तो दर्द का अहसास मुङो होता है। डाक्टर तुरंत बोला पहले कि हत्या करो या अभी जो जन्मा नहीं उसकी हत्या करो दोनों गुनाह है, पाप हैं। यह बात उस स्त्री को समझ आ गई । इस प्रसंग से भी समझ जा सकता है कि जो लोग इस अपराध को अंजाम दे रहे हैं वे किसी की हत्या कर रहे हैं, ये बात उन्हें भी समझ आ जाए।
दूसरा मसला रेप का है जो आज भारतीय समाज में जंगल में आग की तरह फैल रहा है। यह दिन-प्रतिदिन और ज्यादा बढ़ता जा रहा है। हाल का ही, पांच साल की बच्ची से उसके पड़ोसी का रेप करना या फिर 8 साल की गुड़िया का उसके मामा द्वारा रेप का मामला हो, ऐसे सभी मामले दरिंदगी की इंतेहा को पार कर चुके लोगों से हमें मुखातिब कराते हैं। कहते हैं इंसान पहले जानवर था फिर काफी प्रयासों के बाद वह इंसान बन सका पर आज इंसान एक बार फिर ऐसे कृत्य कर रहा है जो उसे पुन: जानवरों की श्रेणी में ला रहा है। इन अपराधों को रोकने के लिए दिल्ली सामूहिक दुष्कर्म के बाद सरकार द्वारा महिलाओं के लिए लाया गया बिल इस दिशा में एक मजबूत कदम है। यह तब और कारगर होगा जब यह प्रभावी ढंग से लागू हो। दिल्ली आज देश की राजधानी होने के साथ ही दुष्कर्मियों की भी राजधानी बनती जा रही है। यहां देश के सर्वाधिक यानि प्रतिदिन 2 रेप केस होते हैं। दुष्कर्म के दोषी को फांसी की सजा के प्राविधान ने ऐसा करने वालों में कुछ डर जरूर पैदा किया होगा। इसके बाद यदि दहेज को लेकर बात करें तो यहां भी हालात बेकाबू हैं। आज शादी दो दिलों, दो परिवारों के मिलन का प्रतीक नहीं रह गई है। अब शादी के मायने बदल रहे हैं। लोग अब शादी दहेज के लोभ में करते हैं,जो कानूनी जुर्म है और आईपीसी 498 (अ) में सजा योग्य है। शादी आज दो दिलों के मेल से ज्यादा स्टेटस का प्रतीक बन गयी है। जब तक मध्यमवर्गीय लड़के को कार नहीं मिल जाती उसे अपनी तौहीन महसूस होती है।
कुछ तो न चाहते हुए भी झूठी शान-ओ-शौकत के चलते दहेज की तरफ भागते हैं क्योंकि अगर एक आम आदमी के लड़के की शादी में चार पहिया गाड़ी नहीं मिलती है, तो समाज क्या कहेगा का डर उसे दहेज की ओर खींच ले जाता है। यदि यह मांग पूरी नहीं हो पाती तो शादी या तो बीच में ही तोड़ दी जाती है या फिर शादी के बाद लड़की को अनेक प्रताड़नाएं देते हुए मायके वालों से दहेज लाने की मांग की जाती है और यदि दहेज के भूखे इन भेड़ियों की मांग एक बार पूरी कर दी जाती है तो फिर दिनों-दिन इनकी ये नाजायज मांगंे बढ़ती ही जाती हैं। दूसरी ओर अगर इनकी मांग पूरी नहीं होती तो लड़की को या तो जला दिया जाता है या उसे इतना डराया-धमकाया जाता है कि वह खुद ही मौत को गले लगा लेती है। यह भी आइपीसी के 304 (ब) में सजा योग्य है। यह हमारे समाज की विडंबना ही है कि हमारे संस्कृति प्रधान भारत में इस तरह की घटनाएं देखने को मिलती हैं। दहेज भी एक कानूनी अपराध है पर बेचारी लड़कियां इस अपराध की भेंट चढ़ जाती हैं।
छेड़छाड़, ईल वीडियो द्वारा बदनाम करना भी आज के आधुनिक जमाने में तेजी से बढ़ रहा है। सोशल नेटवर्कि ग साइट का गलत प्रयोग और इसकी अधूरी समझ इनके मुख्य कारण हैं। मुरादाबाद की प्रीति का एक ईल वीडियो अपलोड कर उसे बदनाम कर दिया गया जिसके बाद उसने मौत को गले लगा लिया। यह घटना सिर्फ प्रीति के साथ ही नहीं हुई है, ऐसे तमाम केस साइबर क्राइम डिपार्टमेंट के पास हैं जहां लड़कियां इस तरह की घटना का निशाना बनीं। हम जिस कोख में पलते हैं वह स्त्री की, जिस धरती पर जीवन व्यतीत करते वह नारी स्वरूप। गंगा मां का जल और गौ माता का दूध पीकर हम अपना जीवन जीते हैं तो फिर हम उसी स्त्री को बदनाम क्यों करते हैं? तेजाब का हमला, परिवार का लड़को जैसा बनने का दबाब, कुपोषण भी एक स्त्री ही सहे, शराब पीकर पति का मारना भी औरत ही सहे। जबकि तेजाब से हमला करना आइपीसी 364 (अ) के अंतर्गत आता है और पति द्वारा पत्‍नी को प्रताड़ित करना घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत आता है। इसके बाबजूद दरिंदों में कोई डर नहीं है। आज जनसंख्या की गणना करने वाली आरजीआइ के एसआरएस के आंकड़े बताते हैं कि अब प्रति 1000 पर 914 लड़कियों का अनुपात रह गया है, जो पिछले वर्ष के मुकाबले 1 कम है। यह गंभीर चिंता का विषय है।

दशहरे की धूम

शहर-दर-शहर दशहरे की धूम



दशहरे की धूम देश की विविधता पर्वो को भी क्षेत्रीय रंगों में भिगोकर एक अलग पहचान देती है। विजयादशमी अर्थात दशहरे के साथ भी ऐसा ही है। रामकथा से जुड़े इस पर्व की धूम देशभर में होती है। असत्य पर सत्य, बुराई पर अच्छाई की विजय के उत्सव के रूप में यह पर्व मनाया जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों में इसकी विभिन्नता उन्हें विशिष्ट भी बनाती है। यही वजह है कि देश के ज्यादातर हिस्सों में जहां इसे रावण,मेघनाद एवं कुम्भकरण के पुतले के दहन के साथ मनाया जाता है, वहीं द्रविड़ प्रदेशों में रावण दहन नहीं किया जाता। इस पर्व के साथ कई दूसरी कथाएं और मान्यताएं भी जुड़ी हैं। इस उत्सव को कृषि, शस्त्र पूजन, अपराजिता देवी और नीलकण्ठ पक्षी से भी जोड़ा जाता है। भिन्नता और भव्यता की कसौटी पर खास पहचान बनाने वाले देश के मुख्य दशहरा आयोजनों पर आधारित यह रिपोर्ट.. गर हमारे देश में कोस-कोस पर पानी और चार कोस पर बानी बदल जाती हो तो हमारे पर्व इन बदलावों से कैसे अछूते रह सकते हैं? विजयादशमी अर्थात दशहरा का पर्व भी अपने मूल में एक मुख्य भावना को लिए होते हुए भी देश के अलग- अलग हिस्सों में अलग-अलग रूप पा जाता है। यह विभिन्नता ही उसे विशिष्ट बनाती है। अगर आपने कुल्लू का दशहरा देखा है तो आप यह नहीं कह सकते कि आप मैसूर के दशहरे को देखने के आनन्द का अनुभव कर सकते हैं। वास्तव में देश के विभिन्न हिस्सों में दशहरा के अलग ठाठ, अलग रंग हैं। तभी तो यह कहीं 10 दिन तक मनाया जाता है तो कहीं इसका आयोजन 75 दिनों तक चलता है। कहीं गरबा होता है तो कहीं उपहार बांटे जाते हैं और कहीं दीप जलाए जाते हैं। रावण और उसके भाइयों मेघनाद और कुम्भकरण के पुतले तो हर जगह जलाए जाते हैं लेकिन कहीं कोई राजनेता तीर छोड़ता है, कहीं भव्य शोभायात्रा के साथ ऐसा किया जाता है। मुख्य मान्यता है कि दशहरा राम कथा से जुड़ा हुआ आयोजन है। कहते हैं कि दस सिरों वाले लंकापति रावण को भगवान राम ने उसके बुरे कर्मो की सजा उसका वध करके दी थी। साथ ही मेघनाद और कुम्भकरण जैसे अत्याचारियों का भी सर्वनाश किया था। यही वजह है कि आज भी रावण के साथ मेघनाद और कुम्भकरण के विशाल पुतलों को जलाया जाता है। हर जगह का दशहरा अपने आप में निराला है। कोलकाता, कोटा, बस्तर, कुल्लू, अल्मोड़ा, मुंबई, मैसूर और दिल्ली जैसे नगरों में दशहरा उत्सव की भव्यता देखते ही बनती है।
अ मैसूर का दशहरा मैसूर का दशहरा अपनी भव्यता के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। माना जाता है कि नवरात्रि उत्सव के आखिरी दिन मैसूर के राजा अपनी प्रजा से मिलने जाते थे और उनके द्वारा दिए गए उपहारों को प्रेम पूर्वक स्वीकार करते थे। यहां दशहरा उत्सव मनाने के साथ-साथ महाभारत काल से जुड़े शमी वृक्ष की भी पूजा की जाती है। उस वृक्ष की पत्तियों को स्वर्ण मानकर सभी लोगों में वितरित किया जाता है। इस वृक्ष को लेकर मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अपने शस्त्रों को यहीं सुरक्षित किया था इसलिए यह वृक्ष न्याय और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। मैसूर वासियों का मत है कि जिस प्रकार पांडवों ने अपने धर्म की रक्षा की उसी प्रकार यह वृक्ष भी उनकी रक्षा करेगा। मैसूर में दशहरे पर एक विशाल प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है। चंदन की लकड़ी से बनी कलाकृतियां, अगरबत्तियां और रेशमी साड़ियों के लिए लोग वर्ष भर इस प्रदर्शनी का बेसब्री से इन्तजार करते हैं। दशहरे के अवसर पर मैसूर महल को सजाया जाता है और करीब पांच किलोमीटर लम्बी शोभायात्रा निकाली जाती है। इस दौरान आतिशबाजी का कार्यक्रम देखते ही बनता है, लेकिन कर्नाटक तथा दूसरे द्रविड़ प्रदेशों में रावण दहन की परम्परा नहीं है।
दिल्ली का दशहरा रावण और उसके पुतला दहन की भव्यता को देखना हो तो दिल्ली के दशहरे को देखना चाहिए। दिल्ली में लगभग 300 रामलीलाएं होती हैं। इनमें से 20 बड़ी रामलीलाएं हैं,जिनका बजट दो से पांच करोड़ का तक का होता है। कमान से छूटे तीरों से आग निकलना, लक्ष्मण रेखा पार करने पर रेखा से आग निकलना, वायु मार्ग से हनुमान का संजीवनी बूटी लाना, लक्ष्मण-मेघनाद का जमीन से 45 फिट ऊंचाई पर मायावी युद्ध, सीता हरण के लिए हेलीकॉप्टर का प्रयोग, 90 मीटर के तीन तल वाले मंच, रावण के भव्य पुतले का निर्माण, कुं भकर्ण को क्रेन से उठाने की व्यवस्था, लीला के प्रवेश द्वारों का भव्य निर्माण आदि इस आयोजन में गजब का रोमांच भर देते हैं। राम बारात में शामिल स्वचालित झंकियों ने दिल्ली की रामलीला को पूरे भारत में प्रसिद्ध कर दिया है। रामलीला मैदान में प्रतिवर्ष होने वाले दशहरा उत्सव की ख्याति इस कारण भी है कि इसमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित कई केन्द्रीय मंत्री और राजनेता भाग लेते हैं।
कोलकाता का दशहरा कोलकाता में दशहरा का उत्सव मुख्यत: नवरात्रि पर्व और शक्तिपूजा से जुड़ा है। वैसे भी रामकथा के अनुसार यह मान्यता है कि राम ने रावण के वध के पूर्व देवी की उपासना की थी। दुर्गापूजा बंगालियों का सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है। यहां दशहरा मुख्यत: पांच दिनों तक मनाया जाता है। देवियों को भव्य पंडालों में रखा जाता है। साल भर अपनों से दूर रहने वाले लोग विजयादशमी के दिन घर जरूर आते हैं। बच्चे बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं और बड़े भी प्रेम भाव से उनका आलिंगन करते हैं। इस प्रथा को बंगाली में ‘कोलाकुली’ कहा जाता है। इसके अतिरिक्त पास पड़ोस वालों को शुभो विजया की बधाई दी जाती है। विजयादशमी के दिन देवियों को नदी में विसजिर्त करने से पहले महिलाओं द्वारा ‘सिंदूर खेला’ नामक प्रथा का प्रचलन है। वे एक पंडाल में इकट्ठा होकर देवियों की पूजा अर्चना के बाद एक दूसरे की मांग में सिंदूर भरकर विवाह सम्बन्धों की प्रगाढ़ता की प्रार्थना करती हैं। इस उत्सव पर बनने वाले व्यंजनों में मालपुआ और निमकी खासतौर पर लोकप्रिय हैं।
अल्मोड़ा का दशहरा अल्मोड़ा अत्यंत सुन्दर व सुरम्य पर्वतीय स्थलों में से एक है। यदि एक बार अल्मोड़ा के आसपास की नैसर्गिक सुन्दरता एवं दशहरा महोत्सव को देख लिया तो निश्चित ही मन बार-बार यहां आने को करेगा। अल्मोड़ा का दशहरा महोत्सव साम्प्रदायिक सौहार्द का प्रतीक भी है। यूं तो अल्मोड़ा में राक्षस परिवार के पुतले देश के अन्य भागों की तरह ही बनाये जाते हैं, लेकिन अन्य स्थानों की अपेक्षा यहां के पुतले कलात्मकता और भव्यता के साथ उन कलाकारों के द्वारा निर्मित होते हैं जो किसी भी तरह से पेशेवर नहीं हैं। ये कलाकार हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई अथवा किसी भी धर्म, सम्प्रदाय के हो सकते हैं। अल्मोड़ा में दशहरा महोत्सव की तैयारी एक माह पहले से ही शुरू हो जाती है। बच्चों भी अपने लिए छोटे-छोटे पुतले लेकर आते हैं। कई जगह इन पुतलों को टेसू कहा जाता है। वहीं दशहरा आयोजन में अल्मोड़ा का हर मोहल्ला रावण परिवार के पुतलों के निर्माण के लिए सक्रिय हो जाता है। इन पुतलों की नयनाभिराम छवि, आंख, नाक तथा विशिष्ट अवयवों को अनुपात देने में यहां के शिल्पी अपनी समस्त कला झोंक देते हैं। दशहरे के दिन दोपहर से यह पुतले अपने निर्माण स्थल से निकलते हैं। पुतलों की यात्रा यहां के मशहूर लाला बाजार से एक जुलूस के रूप में प्रारंभ होती है। इन पुतलों में रावण, मेघनाद, कुम्भकर्ण, ताड़का, सुबाहु, त्रिशरा, अक्षयकुमार, मकराक्ष, खरदूषण, नौरा आदि के पुतले अनोखी आभा लिए होते हैं। पहले यह पुतले शहर में जुलूस के रूप में नहीं आते थे। एक दशक पूर्व अख्तर भारती जैसे कलाकारों ने मेघनाद के पुतले से इस उत्सव को जो दिशा दी उसी का परिणाम है कि आज एक दजर्न से ज्यादा पुतलों का जुलूस निकाला जाता है।
कुल्लू का दशहरा कुल्लू में दशहरा देवताओं के मिलन के रूप में मनाया जाता है।
माना जाता है कि देवता जमलू ने कई देवताओं को एक साथ टोकरी में उठाकर किन्नर कैलाश की ओर से कुल्लू पहुंचाया था।
तभी से कुल्लू को देवताओं की भूमि माना जाता है। देश के दूसरे भागों में जब विजयादशमी समाप्त हो जाती है, तब कुल्लू में इसका आयोजन शुरू होता है। दशमी से पूर्णिमा तक कुल्लू के ढाल मैदान में देवता साज-सज्जा और गाजे-बाजे के साथ लाए जाते हैं। लोगों की परंपरागत वेशभूषा और नृत्य के कारण कुल्लू का दशहरा बहुत मनमोहक होता है। मेले का मुख्य आकर्षण रघुनाथ जी की यात्रा होती है, जिसमें राजपरिवार के सदस्य राजसी वेशभूषा में सम्मिलित होते हैं। इस अवसर पर द्वापर युग की राक्षसी हिडिंबा के प्रतीक की उपस्थिति भी अनिवार्य मानी जाती है। उनके बिना रघुनाथ जी की यात्रा सम्पन्न नहीं होती है।
यात्रा के दौरान कृत्रिम रूप से बनाई लंका को जलाकर दशहरे को सम्पन्न किया जाता है और लौटते समय रघुनाथ जी के साथ सीता जी को भी विराजमान किया जाता है। इस प्रकार यह पर्व राम द्वारा लंका से सीता को छुड़ाकर लाने का प्रतीक माना जाता है।
बस्तर दशहरा की अनूठी परम्परा छत्तीसगढ़ के बस्तर का दशहरा का अपना ही रंग है। बस्तर में 75 दिन तक दशहरे का उत्सव मनाया जाता है। आस्था है कि वनवास के दौरान भगवान राम ने 14 दिन बस्तर में व्यतीत किए थे। यहां दशहरा पर्व के जुलूस में मां दंतेश्वरी देवी के छत्र की अनूठी रथयात्रा निकलती है । शोभायात्रा का मुख्य आकर्षण द्वितलीय रथ होता है। इस रथ को आदिवासी ही खींचते हैं। रथ को तैयार करने की लगभग 598 वर्षों से एक अनूठी पंरपरा है।
इसे बनाने का काम सिर्फ संवरा जाति के लोग ही करते हैं। इस जाति की यह परंपरा काफी समय से है। यह रथ काफी बड़ा होता है और कई तरह की चीजों से सुसज्जित होता है। दशहरा पर लाखों की संख्या में लोगों की भीड़ यहां उमड़ती है। ढोल नगाड़े ताशे बजाकर पूरे माहौल को ऐसा बना दिया जाता है कि मानो कोई विजयश्री प्राप्त कर लौट रहा हो। छत्तीसगढ में रथ बनाने वाली संवरा जाति के लोग अब आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं।
आज भी इन्हें रथ के मेहनताना के नाम पर मामूली राशि,एक बकरा और कुछ वस्तुएं ही मिलती हैं। छत्तीसगढ़ पर्यटन विभाग इस मौके पर निकलने वाली शोभायात्रा में एक हजार दीपों को प्रज्ज्वलित कराता है।
कोटा का दशहरा मेला कोटा का दशहरा भी देश भर में अपनी अलग पहचान रखता है। इस अवसर पर एक विशाल मेला लगता है, जो अपनी भव्यता और व्यापक जनभागीदारी के कारण देश भर में प्रसिद्ध है। दशहरा तक मेले की धूम शहर में रहती है। राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत यहां के मेले में अलग ही समां बांधती है।
कोटा राजस्थान के दक्षिणी भाग के हाड़ौती क्षेत्र में स्थित है।
चम्बल के पूर्वी किनारे पर स्थित कोटा में दशहरे से काफी पहले ही तैयारियां प्रारम्भ होने लगती हैं। रावण और उसके प्रमुख सेनानियों, मेघनाद व कुम्भकर्ण के विशाल पुतलों के निर्माण की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। दशहरा से दो महीने पहले ही पुतलों का निर्माण कार्य होने लगता है। दूर- दराज से पुतले बनाने के कारीगर यहां जुटने लगते हैं। पुतलों को भव्य बनाया जाता है।
कोटा का रावण दहन देशभर में प्रसिद्ध है। रावण, मेघनाद, कुम्भकर्ण के विशाल पुतले रंगीन कागज और बांस की खपच्चियों से तैयार होते हैं। इनमें बड़ी मात्रा में पटाखे और बारूद भरा रहता है। राम के स्वरूप रावण के पुतले की नाभि में तीर मारकर उसका दहन करते हैं। दशहरा के साथ भव्य रामलीला का आयोजन भी चलता है।
दशहरे पर जहां पूरा देश रावण का पुतला जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाता है, वहीं एक जगह ऐसी भी है, जहां मातम और सन्नाटा पसरा रहता है। लोगों पर दशहरे का खौफ छाया रहता है क्योंकि यहां आज तक जिसने भी दशहरा मनाने की कोशिश की वह दूसरा दशहरा नहीं देख पाया, उसकी मौत हो गई। हिमाचल प्रदेश का बैजनाथ अपने प्राचीन शिव मंदिर के कारण पूरे साल सैलानियों की चहल-पहल से गुलजार रहता है। दशहरे के दिन इस पूरे शहर में वीरानी छाई रहती है। मान्यता है कि यहां पर रावण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तप करते हुए अपने दस शीश अर्पित कर दिए थे। इलाके के लोगों की माने तो जिसने भी दशहरा मनाने की कोशिश की वह अगला दशहरा नहीं देख पाया। खास बात यह भी है कि पूरे शहर में एक भी सुनार की दुकान नहीं है। अगर दुकान खोली भी गई तो वह जलकर खाक हो गई। इलाके के राम दित्ता ने बताया कि जिस किसी ने भी रामलीला या दशहरा मनाने की कोशिश की उसकी मौत हो गयी। लोगों में धारणा बन गयी की ऐसा रावण की नाराजगी के कारण हुआ।
बैजनाथ मंदिर के पुजारी के मुताबिक यहां पर रावण ने शिव को अपने दस शीश भेंट किये थे। तब से इसे रावण की तपस्थली के तौर पर जाना जाता है और उसके सम्मान में ही दशहरा नहीं मनाया जाता। यहां तक की सोने की लंका के चक्कर में शहर में कोई सोने की दुकान तक नहीं है। उन्होंने बताया कि बैजनाथ में रावण का एक मंदिर भी है, जहां उसके पैरों के चिह्न हैं और रावणोश्वर लिंग भी है।
हालांकि यह हिस्सा काफी खराब हो चुका है।
जहां आज भी नाराज है रावण महाराष्ट्र में दशहरा दशहरा महाराष्ट्र में सिलंगण के नाम से सामाजिक महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यहां भी मैसूर की तरह ही सायंकाल के समय सभी ग्रामीणजन सुंदर-सुंदर नये वस्त्र धारण कर गांव की सीमा पार कर शमी वृक्ष के पत्ताें को अपने गांव लाते हैं। फिर उन पत्ताें का परस्पर आदान-प्रदान करके बड़े-बूढ़ों के पांव छू कर आशीर्वाद लेते हैं। इस अवसर पर समूचे गांव में भक्ति रस में डूबे लोकगीतों को गाया जाता है।
दक्षिण में दशहरा तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश तथा कर्नाटक में दशहरा नौ दिनों तक चलता है, जिसमें लोग लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा की पूजा करते हैं। पहले तीन दिन लक्ष्मी का पूजन होता है। अगले तीन दिन सरस्वती की अर्चना की जाती है और अंतिम दिन देवी दुर्गा की स्तुति की जाती है। पूजा स्थल को दीपकों से सजाया जाता है। दशहरा यहां के बच्चों के लिए खासतौर पर शिक्षा या कला संबंधी कोई नया काम सीखने के लिए शुभ माना जाता है।

विजयदशमी का त्योहार


 पापों को हरने का त्योहार
त्योहार लोक जीवन की प्रगाढ़ता के केन्द्र बिन्दु माने जाते हैं। यह न केवल हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक जीवन को प्रभावित करते हैं वरन इनके साथ हमारी आर्थिक गतिविधियाँ भी पूरी तरह से जुड़ी हुई हैं। त्योहार पग पग पर व्यक्ति को समाज के साथ जोड़ते हैं। प्रकृति के बदले परिधानों के साथ जुड़े त्योहार फूलों के बदलते रंगों की भाँति व्यक्ति को लुभाते रहते हैं। इनकी विविधता मानव को अपने मोहपाश में बाँधे रखती है।
विजयदशमी का त्योहार वर्षा ऋतु की समाप्ति तथा शरद के आगमन की सूचना देता है। ब्राrाण इस दिन सरस्वती का पूजन करते हैं जबकि क्षत्रिय शस्त्रों की पूजा करते हैं। अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में यह त्योहार सदियों से भारत के कोने कोने में मनाया जाता है। सीधे सरल रूप से भारतीय जनमानस ने यह स्वीकार कर लिया है कि इस दिन भगवान राम ने असुर रावण पर विजय पाई थी जबकि अनेक विद्वान इस बात को भ्रामक मानते हैं।
एक अन्य कथा के अनुसार परशुराम की माता रेणुका ने शापग्रस्त देवताओं के आग्रह पर उनके कुष्ठ रोग दूर करने के लिए अपने पति ‘भृगु’ की आज्ञा के बिना नौ दिन तक देवताओं की सेवा की फलत: दसवें दिन उनका कोढ़ दूर हो गया। शाप मुक्त होने के कारण देवताओं ने यह दिवस दु:ख मुक्ति अथवा विजय दिवस के रूप में मनाया। इस दिन आश्विन शुक्ला दशमी थी अत: तभी से यह दिन विजय दशमी के रूप में मनाया जाने लगा। इसी प्रकार इस दिन को नरकासुर राक्षस के वध के साथ भी जोड़ा जाता है। कहते हैं कि नरकासुर ने अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए 1600 स्त्रियों की बलि देने का निश्चय किया। उसे वरदान प्राप्त था कि उसका वध केवल नारी द्वारा ही होगा। भगवान श्री कृष्ण ने ‘सत्यभामा’ के हाथों उसका वध करवाया। नरकासुर के हाथों बच जाने के कारण नारियों ने इसे विजय पर्व के रूप में मनाया।
चाहे राम ने रावण का संहार किया हो अथवा अजरुन द्वारा कौरवों पर विजय पाई गई हो-यह दिवस सर्वत्र निर्विवाद अधर्म पर धर्म की जीत के रूप में मनाया जाता है।
दशहरा एक प्रतीक पर्व है। राम-रावण के युद्ध में जिस रावण की कल्पना की गई है वह है मन का विकार और विकार रहित परम पुरुष हैं राम। सीता आत्मा है जबकि राम स्वयं परमात्मा। आत्मा का अपहरण जब रावण ने किया तो चारों ओर धर्म नष्ट होने लगा लोग वानरों की भाँति चंचल और उच्छृंखल होने लगे तब राम ने उनको अर्थात उनके काम-क्रोध-मोह आदि को अनुशासित किया तभी रावण का वध संभव हो पाया। राम और रावण विपरीतार्थ के बोधक हैं। रावण का अर्थ है रुलाने वाला जबकि राम का अभिप्राय है लुभाने वाला। रावण के दस सिर कहे गए हैं। उसका सिर तो एक ही है शेष काम, क्रोध, मद, मोह, मत्सर, लोभ, मन, बुद्धि और अहंकार को उसके सिरों के रूप में स्वीकार किया गया है।
महाराष्ट्र और उससे लगे भू प्रदेशों में दशहरे के दिन आपटा अथवा शमी वृक्ष की पत्तियाँ अपने परिजनों एवं मित्रों में सवर्ण के रूप में वितरित करने की प्रथा है। आपटा वृक्ष की पत्तियाँ मध्य से दो समान भागों में विभक्त रहती हैं। यह वृक्ष गाँव की सीमा से बाहर ही होते थे। इस पत्ती को गाँव की सीमा से बाहर जा कर तोड़ना ही सीमोल्लंघन है। यह पत्ती द्वैत वृत्ति पार कर अद्वैतवृत्ति में जा कर दशेंन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने का प्रतीक है। इसी प्रकार शमी की पत्तियाँ सुवर्ण मान कर वितरित की जाती हैं। शमी वृक्ष की पत्तियाँ बुद्धि के देवता गणोश जी को अर्पित की जाती हैं। शम् अर्थात् कल्याणकारक। ‘शमीं’ वह कल्याणकारी अवस्था है जो बुद्धि के देवता की शरण में जाने पर प्राप्त होती है। बुद्धि के देवता की शरण में जाने का अर्थ भी दशेन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना ही है। कई शताब्दीयों से मनाये जाने वाले इस त्योहार को मध्य युगीन राजाओं, महाराजाओं ने नए आयाम दिए, कुल्लू, कोटा, और कर्नाटक में आज भी 14वीं शताब्दी की कई बातों की झलक मिल जाती है। कुमाउँ का दशहरा भी उत्तर भारत में रामायण के पात्रों के पुतलों के कारण काफी चर्चित है।
कुल्लू में दशहरा देवताओं के मिलन का मेला मान कर मनाया जाता है। विश्वास किया जाता है कि देवता जमलू ने देवताओं को एक टोकरी में उठा कर किन्नर कैलाश की ओर से कुल्लू पहुँचाया था। तभी से कुल्लू देवताओं की भूमि मानी जाती है और यहाँ पर देवताओं का मिलन प्रति वर्ष होता है। कुल्लू घाटी के प्रत्येक गाँव का अपना ग्राम देवता होता है। प्रत्येक देवता का अपना मेला लगता है। देश के दूसरे भागों में विजय दशमी के समाप्त होते ही आश्विन शुक्ल दशमी से पूर्णिमा तक कुल्लू के ढाल मैदान में सभी देवता सज धज कर, गाजे बाजे के साथ लाये जाते हैं। परम्परागत वेश भूषा में सजे स्त्री पुरुष देवता की सवारी के साथ आते हैं। कुल्लू की घाटी के कण कण में लोक नृत्य, संगीत और मस्ती भरी हुई है फलत: यह मिलन स्थली विभिन्न प्रकार के बाह्य यंत्रों के स्वरों एवं लोक नर्तकों की थापों पर थिरक उठती है।
दक्षिण भारत में कर्नाटक प्रान्त के मैसूर नगर का दशहरा भी अपनी भव्यता और तड़क भड़क के लिए विश्व प्रसिद्ध है। कन्नड़ में दशहरे को नांदहप्पा अर्थात राज्य का त्योहार कहा जाता है। 15वीं शताब्दी में मैसूर के लोकप्रिय एवं कलाप्रेमी राजा कृष्ण देव राय ने इस उत्सव को राजकीय प्राश्रय दिया, नवरात्रि उत्सव के अन्तिम दिन राजा हाथी पर सवार हो कर नागरिकों के मध्य जाते और उनके द्वारा सम्मानपूर्वक दिए गये उपहार प्रेम से स्वीकार करते। राजमहल से चल कर राजा की यात्रा नगर सीमा बाहरबली मंडप तक जाती। यहाँ पर दशहरे के साथ महाभारत काल से ही जुड़े शमी वृक्ष की पूजा की जाती और इस वृक्ष की पत्तियों को सुर्वण मान कर परिजनों में वितरित किया जाता है। महाराष्ट्र में भी दशहरे पर आपटा वृक्ष की पत्तियों को स्वर्ण मान कर बाँटने की प्रथा है। वास्तव में आपटा वृक्ष की पत्तियाँ मध्य से दो समान भागों में विभक्त रहती हैं। दिखने में अत्यन्त सुन्दर यह पत्ती अद्वैत और बुद्धिमत्ता का प्रतीक मानी जाती है। इन्हें अभिवादन और उज्‍जवल भविष्य का सूचक माना जाता है। इसी कारण इसे मित्रों में वितरित करने की प्रथा है।
शमी वृक्ष के संबंध में विद्वानों का मत है कि पांडवों ने अपने एक वर्ष के अज्ञातवास में इसी वृक्ष पर अपने अस्त्र शस्त्र छिपा कर रखे थे। इस वृक्ष को न्याय, अच्छाई और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। कर्नाटक के निवासियों का मत है कि जिस प्रकार पांडवों ने धर्म की रक्षा की उसी प्रकार से यह वृक्ष उनकी तथा उनके परिजनों की रक्षा करेगा।
इस त्योहार को प्राश्रय देने वाला विजय नगर राज्य अपने अपार वैभव के लिए विश्व प्रसिद्ध था फलत: राजा की सवारी बहुत ही भव्यता के साथ निकाली जाती थी।
आजकल जुलूस में राजा का स्थान महिषासुरमर्दिनी चांमुडेश्वरी देवी की प्रतिमा ने ले लिया है। चामुंडेश्वरी देवी का मन्दिर मैसूर महल से थोड़ी ही दूर एक सुन्दर पहाड़ी पर बना हुआ है।
मैसूर में दशहरे के अवसर पर एक विशाल प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है। इसमें देश भर से व्यापारी पहुँचते हैं। राज्य के महत्त्वपूर्ण कला-शिल्प यहाँ पूरी सज धज के साथ रखे जाते हैं।
चन्दन की लकड़ी से बनी कलाकृतियाँ, अगरबत्तियों और रेशमी साड़ियों के लिए लोग इस उत्सव की वर्ष भर प्रतीक्षा करते हैं।
सांस्कृतिक गतिविधियों की चहल पहल से भरे वातावरण में मैसूर का राजमहल जब विद्युत के प्रकाश से जगमगाता है तो उसकी छटा देखते ही बनती है।
कुल्लू और कर्नाटक की ही भाँति कोटा, राजस्थान का दशहरा भी पिछले पांच सौ वर्ष से हडौती संभाग की जनता के लिए आकर्षक का केन्द्र बना हुआ है। उत्तर भारत का यह सबसे प्राचीन दशहरा माना जाता है। कोटा के महाराजा इसे शक्ति पर्व के रूप में मनाते आये हैं। 15वीं शताब्दी में राव नारायण दास ने मालवा सुल्तान महमूद को परास्त करने के उपलक्ष में इसे प्रारम्भ किया था।
1571 में कोटा राज्य की स्थापना के साथ राव माधे सिंह ने यहाँ लंका पुरी का निर्माण कराया और पुतलों के स्थान पर मिट्टी के रावण-वध की प्रथा डाली। स्वतंत्रता प्राप्ति तक यहाँ 15.20 फुट ऊंचे रावण, मेघनाथ और कुम्भकर्ण के मिट्टी के पुतले बनाये जाते थे। उनके गले में बंधी जंजीर को खींच कर राजदरबार का शाही हाथी उनका वध करता था। 1771 में जब महाराव उम्मेद सिंह गद्दी पर बैठे तो उन्होंने इस उत्सव के सार्वजनिक रूप को निखारा।

Monday, October 7, 2013

after log time...

Ek Bar Suno Kuch Aisa Hua
Wo Mujko Mila, Main Usko Mili
Pyar Hua, Izhar Hua
Wo Dost Bana Me Yar bani
Use Ishq Bahut, Mujhe Pyar Bahut
Hum dono me takrar Bahut
Phir Kuch Yun Hua...
Wo Chorh Gaya Main Toot Gayi

after log time...

Phir Kuch Yun Mile...
Wo Tanha Tha, Main Akeli Thi
Bas Hum Do The, Or Koi Na Tha
Wo Rone Laga, Main Bebas Rahi
Na Pyar Raha.. Na Izhar Raha
Bas Farq Sirf Itna Sa Raha
WO MITI K UPAR ROTA RAHA
ME MITTI K ANDAR SOTI RAHI...

Saturday, October 5, 2013

अनजान मोबाइल नम्बर खुलासा करती वेबसाइट्स

अनजान मोबाइल नम्बर खुलासा करती वेबसाइट्स

अगर आपको किसी अनजान नंबर से मिस्ड कॉल या मैसेज आ रहा है तो अब आप उसकी लोकेशन और उससे जुड़ी दूसरी बातों का पता आसानी से लगा सकते हैं। अब तक ऐसे मोबाइल नंबरों की लोकेशन पता लगाने के लिए आपको बार-बार उस पर कॉल करनी होती थी या कस्टमर केयर सेंटर पर कॉल कर के आप पता करने की कोशिश करते थे। लेकिन अब कहीं कॉल करने की जरूरत नहीं।
इंटरनेट पर मौजूद कुछ वेबसाइट्स से आप उनके बारे में पूरी जानकारी ले सकते हैं और मिस्ड कॉल देने वाले को उसके बारे में ही सटीक जानकारी दे कर चौंका सकते हैं। इनका इस्तेमाल करके आप न सिर्फ भारतीय मोबाइल नंबर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नंबरों के बारे में भी जानकारी पा सकते हैं।
इन नंबरों का पता लगाने के लिए आपको कुछ खास करने की जरूरत नहीं और न ही कोई डिवाइस या उपकरण चाहिए। बस चाहिए तो एक कंप्यूटर या लैपटॉप और एक इंटरनेट कनेक्शन। अनजान नंबरों का पता लगाना बहुत ही आसान है। इसके लिए एक नहीं, बल्कि कई सारी वेबसाइट्स मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल कर के किसी भी मोबाइल नंबर की लोकेशन सर्विस देने वाली कंपनी, सिम का प्रकार जैसे जीएसएम या सीडीएमए और इससे जुड़ी कई बातें आप पता कर सकते हैं। ये साइट्स किसी नंबर के रिकॉर्ड की जानकारी भी देती हैं।

सबसे पहले भारतीय मोबाइल नंबरों के बारे में बात करते हैं। भारतीय मोबाइल नंबरों के बारे में कई साइट्स से जानकारी ली जा सकती है।
trace.bharatiyamobile.com
यह साइट 119 करोड़ भारतीय मोबाइल नंबरों के बारे में जानकारी मुहैया करा सकती है। इस साइट से किसी भी नंबर की जानकारी के लिए सर्चबार में वो नंबर टाइप करना होगा, जिसके बारे में आप जानकारी चाह रहे हैं। इसमें केवल दस अंकों का मोबाइल नंबर ही टाइप करना है। उससे पहले 91 नहीं लगाना है। यह साइट केवल भारतीय मोबाइल नम्बरों की ही जानकारी देती है। जैसे ही इस पर नंबर टाइप कर के ट्रेस पर क्लिक करेंगे, यह साइट मोबाइल नंबर की लोकेशन, उस कंपनी का नाम जो सिग्नल दे रही है और यह किस प्रकार का सिम है, इन बातों के बारे में जानकारी उपलब्ध कराएगी। इसमें 7 और 8 मोबाइल नंबरों की सिरीज भी शामिल है।
www.hacktrix.com
यह दूसरी साइट है, जो मोबाइल नंबर के बारे में जानकारी प्रदान कर रही है। इस साइट में सर्च बार को जहां नंबर टाइप करना है, पर जाकर दिए हुए लिंक से भी खोला जा सकता है और ऊपर लिखे हुए लिंक से भी सीधे खोला जा सकता है। इसमें जब सर्च बार में मोबाइल नंबर लिख कर क्लिक करेंगे तो यह साइट भी मोबाइल नंबर के बारे में बहुत सी जानकारियां उपलब्ध करा देगी। इसमें भी 91 लगाने की जरूरत नहीं है। यह मोबाइल नंबर के रीजन के बारे में बताती है, लेकिन एक बात जो इन सब साइट्स में समान है, वो यह कि कोई भी साइट फोटो आईडी या एड्रेस के बारे में जानकारी नहीं देती। केवल लोकेशन, टेलिकॉम कंपनी, सिम की टेक्नोलॉजी और इसी तरह की कुछ जानकरियां देती है। ये कोई मोबाइल डायरेक्टरी नहीं है, इसलिए फोन करके या ई-मेल कर के किसी व्यक्ति विशेष की फोटो आईडी या एड्रेस प्रूफ के बारे में जानने की कोशिश न करें। यह साइट वही जानकारी देती है, जिसके लिए टेलिकॉम कंपनी ने इजाजत दी है।
www.informationmadness.com
यह साइट केवल भारत और पकिस्तान के मोबाइल नम्बरों की जानकारी देती है। जब यह साइट ओपन होकर आएगी तो सीधे सर्च बार का ऑप्शन नहीं आएगा। इसके लिए साइट में दाईं ओर मिस्ड कॉल फाइंडर नाम का लिंक दिया गया है। आपको इस लिंक पर क्लिक करना है। उसके बाद सर्च बार खुलेगा और साथ में सेलेक्ट कंट्री नाम का एक ऑप्शन भी दिखाई देगा। सबसे पहले आपको देश (भारत या पकिस्तान) चुनना है। फिर सर्च बार में वो नंबर डाल दें, जिसके बारे में आप जानकारी चाहते हैं। इसके बाद सर्च पर क्लिक करते ही मोबाइल नंबर, उसके टेक्नोलॉजी टेलिकॉम ऑपेरटर और नंबर के रीजन के बारे में जानकारी मिल जाएगी।
http:tp2location.com
यह साइट अंतरराष्ट्रीय नम्बरों के बारे में जानकारी देती है। इसको ऑपरेट करने के दो तरीके हैं। सबसे पहले अगर आप अमेरिका या कनाडा के किसी नम्बर को खोजना चाहते हैं तो यूएस/कनाडा वाले ऑप्शन पर क्लिक करना है और यदि किसी अंतर्राष्ट्रीय नम्बर को खोजना चाहते हैं तो इंटरनेशनल वाले ऑप्शन पर क्लिक करें।
जिस देश के मोबाइल नंबर की जानकारी लेना चाहते हैं, उस देश का मोबाइल कोड नंबर से पहले लगाएं। जैसे भारत के किसी मोबाइल नम्बर के लिए 91 या दुबई के किसी नंबर के लिए 971 लगा कर इंटरनेशनल वाले ऑप्शन पर क्लिक करने पर पता चल जाएगा कि किस देश का नंबर है, उस देश का कोड क्या है, उसकी टेक्नोलॉजी क्या है और टेलिकॉम नेटवर्क यानी किस कंपनी का नंबर है आदि।
साथ में एक संबंधित संपदा नाम का ऑप्शन भी दिखाई देगा, जिस पर क्लिक करके उस नंबर के बारे में और भी जानकारियां जुटाई जा सकती हैं। अगर नंबर से पहले देश का मोबाइल कोड नहीं डालेंगे तो यह साइट नंबर के बारे में गलत जानकारी दे सकती है।
अब करें घर बैठे ऑनलाइन प्रीपेड मोबाइल रीचार्ज
अब कर सकते हैं ऑनलाइन मोबाइल रीचार्ज, वो भी घर बेठे। जी हां अब मोबाइल रीचार्ज करने के लिए कूपन की जरूरत नहीं, बल्कि सीधे आईसीआईसीआई बैंक के अकाउंट से ऑनलाइन रीचार्ज किया जा सकता है। www.icicibank.com पर जाकर ये स्टेप्स फॉलो करें।
1. नेट बैंकिंग यूजर आईडी और पासवर्ड वाला ऑप्शन खोलें।
2. ऑनलाइन बिल पे ऑप्शन पर जाएं।
3. प्रीपेड मोबाइल रीचार्ज पर क्लिक करें।
4. अपने मोबाइल नम्बर का रीजन और टेलिकॉम कंपनी चुनें।
5. अपना मोबाइल नम्बर और रीचार्ज की धनराशि भरें।
6. अंतिम चरण में ट्रांजेक्शन पासवर्ड भर कर उसे पूरा करें।

Friday, October 4, 2013

इंसानियत


कहाँ से और कैसे आया था यह तो भगवान ही जानता था
पांच-छे साल का एक बच्चा चार-पांच दिन से सिग्नल पर नज़र आया था 
चिलचिलाती धूप में नंगे पैर निक्कर और बनियान पहने सिगनल पर खड़ी होती
 गाड़ी को दौड़कर अपनी शर्ट से साफ़ करता और उसके बाद पैसे लेने के लिए हाथ बढ़ाता 
कुछ नरम दिल इंसान पैसे दे देते, कुछ गुस्से से झिड़क देते 
कुछ बिना कुछ दिए गाड़ी आगे बड़ा देते
वो कुछ देर गाड़ी से उडती हुई धूल को मायूसी से देखता
फिर अगला सिगनल होने पर गाड़ियाँ साफ़ करने दौड़ पड़ता
जब कुछ पैसे इकट्टे हो जाते तो फुटपाथ पे खड़े खाने के ठेले के पास खड़ा हो जाता
ठेले वाला भी खाना मांगने पर उसको झिड़क देता
पहले तो अपने और ग्राहकों को निपटाता
भूखा  बच्चा जब तक खाने को भूखी नज़रों से देखता
सब से आखिर में उस बच्चे से पूछता
पहले वो बच्चे से गिनकर पैसे ले लेता
फिर भी उसे बासी बचा-खुचा खाना पकड़ा देता
भूखा बच्चा वहीँ नीचे बैठकर अपना पेट भरता
वही कोने के नल से पानी पी लेता
और चुप चाप पास ही पेड़ की छाया में लेट जाता
एक रात पता नहीं उस बच्चे ने क्या खाया
उसके पेट में जोर से दर्द उठ आया
वो रोया-चिल्लाया पर किसी को तरस नहीं आया
राहगीर दो मिनिट रुकता,ठिठकता फिर मुसीबत के
 डर से अपनी मंजिल पर बढ जाता
रात में तड़प-तड़प कर वो बच्चा इस दुनिया को अलविदा कर गया
सुबह जब कौओ के झुण्ड और शोर से
इंसानों की नज़र पड़ी
तो उनकी भीड़ भी उसके आस-पास बढ़ी
एक इंसान ने मेहरबानी की, पुलिस को फ़ोन द्वारा इत्तिला कर दी
नगर निगम की लावारिश लाश उठाने वाली गाड़ी आई
और उस बच्चे की लाश को उठा कर ले गयी
सिगनल पर भागते दौड़ते उस बच्चे की
तो कहानी यहीं समाप्त हो गयी
दुनिया तो इस ही तरह चलती रही

पर इंसानियत फिर इस दुनिया को रुसवा कर गयी

Wednesday, September 11, 2013

काश तू दस्तक न देता

काश तू दस्तक न देता
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मैने कहा कौन है तू ?
उसने कहा मुसाफिर हूँ
पनाह चाहिए तेरे दिल में
मैने कहा जंग लग चुकी है
अब दिल के इन दरवाज़ों में
खुलते ही नहीं किसी के लिए
उसने कहा मेरी धीमी धीमी दस्तकें
तुझे इन बंद दरवाजों को खोलने पर
मजबूर कर ही देंगे --कुछ इस तरह
खुल ही गए बरसों से बंद दिल के दरवाजे
किये इश्क के वादे सूफियाना अंदाज़
खुद से बढ़ के चाहने का दावा
ता कयामत न बदलने का भरोसा
एक कश्ती के मुसाफिर बाँट ही लेते है
आखिर अपनी तन्हाई और रतजगे --
मैने पूछा वो कौन सी चाहत है
जो तुझे यहाँ लाई मुझ तक
मुझमें तो ऐसा कुछ भी नहीं
वो बोला --सब कुछ तो है जो
मेरी चाहत है तू मेरा ख्वाब है
अब तक कौन था तेरा बोल न ??
तेरा ख्याल बस शबनम सा पाक
और मै उड़ती रही बस उडती ही रही
बिन परों के परिदे की तरह उस की ओर
और वह किसी जादूगर की तरह
हावी हो गया होशोहवास पे --
कुछ इस तरह ज्यू वो शीशा हो
अपना अक्स देखती रही उस में
वो खुश तो मै मुस्कराई
वो रंजीदा हुआ तो तल्खी से भर गई मै
और फिर एक दिन वो बिन बताये
खो गया ठीक उसी तरह जैसे आया था
बिन बुलाये ----एक यकीन था उस पे
खुद से ज्यादा -बहुत खोजा आवाज़ भी दी
ढूंढते ख़ाक छानते देखा तो खड़ा था
भीड़ के बीच मुस्कराते हुए ---कोई गम न था
उसके चेहरे पर मुझसे बिछड़ने का ---
पर मै आजतक सोचती हूँ उसने ऐसा क्यूँ किया
कभी मिले तो बस इतना कहूँगी ---उससे -
काश तूने दस्तक न दी होती --ख़ैर कोई बात नहीं
तू खुश रह मेरा क्या मै तो संभल जाउंगी
पर तू जब बिखरेगा तो ? तेरा क्या होगा