Friday, April 25, 2014

गाँव का मिट्टी का घर


                                                               
                                                गाँव का मिट्टी का घर

पल पल की सारी बाते माँ अब भूल भूल जाती, 
लेकिन उस पुराने घर की याद बार बार चली आती... 

दूर गाँव में कच्चा घर था
फिर भी कितना अच्छा घर था 
लीप पोत कर उसे सजाती 
माटी की खुशबू थी आती 
 सच्चा प्यार वहां पलता था 
 मिट्टी का चूल्हा जलता था..... 


लकड़ी और कंडे जलते थे 
राखी से बर्तन मंजते थे 
थाली भर आटा गुदती 
अंगारों पर रोटी सिकती 
खाने को बिछता था पाटा 
 चक्की से पिसता था आटा..... 


शाम ढले फिर दिया बत्ती 
चिमनी,लालटेन थी जलती 
सभी काम खुद ही करते थे 
नल से पानी भरते थे 
पीट पीट ,कपडे धुलते 
फिर हम सब नहाने चलते..... 


ना था टी वी,ना ट्रांजिस्टर 
बातें करते साथ बैठ कर हम सुना पहाड़े रटते 
होम वर्क बस ये ही करते 
सुन्दर और सादगी वाला 
वो जीवन था बड़ा निराला..... 


वक़्त लगा फिर आगे बढ़ने 
हम गए नौकरी करने 
जहाँ कभी थी रेला पेली 
वह माँ,रह गयी अकेली 
पूरा जीवन जहाँ गुजारा 
ईंट ईंट चुन जिसे संवारा..... 


हम सब जहाँ ,हँसते गाते 
जिसमे बसी हुई है यादे 
सूना पड़ा हुआ है वो घर 
पर माँ का मन अटका उस पर 
आँसु बार बार चली आती 
बिये हुये दिन भुल ना पातीं..... 


पल पल की सारी बाते माँ अब भूल भूल जाती 
लेकिन उस पुराने घर की याद बार बार चली आती.....!!

एक कोशिश बुढ़ापे को करीब से जानने की

एक कोशिश बुढ़ापे को करीब से जानने की


उम्र बढ़ती है, ख्यालात सिकुड़ते हैं। हां,
तजुर्बा बढ़ता जाता है। अपने में सिकुड़ने
का मन करता है। यह हकीकत का जायका है।
विचारों की आंधी चलती है लेकिन
टूटी-बिखरी और अधूरी। हृदय की कठोरता पिघलने लगती है।
अपनेपन की तलाश रहती है, लेकिन अपने पास नहीं होते।यादों का सहारा होता है बस।
रोती हैं यादें भी, उन्हें याद करने वाले
भी। मां की ममता उबलती है, पिता का प्यार, पर बुढ़ापा चुपचाप
रहता है। वह दर्शक है जीवन के
आखिरी पलों का और गवाह भी।
वृद्ध आश्रमों में बहुत उम्रदराज रहते हैं।
उनकी खामोशी सब कुछ बयां करती है।
उनकी नम और थकी आंखें भी शांत हैं। बाहर जर्जरता की चादर है तो अंदर के
जीव की छटपटाहट मार्मिक है। यह
जीवन का मर्म है। इन वृद्धों में से
कईयों को उनके अपनों ने घर से बेघर
किया है। इनसे पूछो तो भर्राये गले से
कहते हैं-‘बच्चों को भूला नहीं जाता।’ जबकि इनके बच्चे इन्हें भूल गये। ये जर्जर
लोग कहते हैं कि उनके अपनों ने जो उनके
साथ किया, वे फिर भी उन्हें याद करते
रहेंगे। अपने तो अपने होते हैं। यह बुढ़ापे का प्रेम है। बुढ़ापा प्रेम
का भूखा है। यह समय यूं ही ऐसे
कटता नहीं। मन चंचल है लेकिन वह
भी ठहर जाता है। जवानी हंसती है
बुढ़ापे की बेबसी पर। अपने बच्चों के प्रति प्यार तमाम
जिंदगी कम नहीं होता। यह प्रकृति है,
प्रेम की प्रकृति। मां हंसी थी जब
बच्चा छोटा था। फिर और हंसी जब वह
जवान हुआ। अब वह आश्रम में है जहां वह
अकेली है। यह विडंबना है, जीवन की विडंबना। कुछ लोग तो हैं आसपास
धीरज बंधाने को। पर वर्षों का दुलार थोड़े ही आसानी से
भुलाया जा सकता है। जागती है
ममता और एक मां, हां एक मां कुछ पल के
लिए तिलमिला उठती है। यह अटूट स्नेह की तड़पन है। आश्रम तो आश्रम हैं, घर नहीं। लेकिन
सोच कभी बूढ़ी नहीं होती। वह कभी जर्जर नहीं होती,
ताजी रहती है। मां झटपटा रही है,
वियोग की पीड़ा और दूरी का दर्द।
घड़ी की सूई, टिक-टिक कर कुछ इशारा कर रही है। नम और
धुंधली आंखों से साफ दिखाई नहीं दे
रहा। वक्त कम है और यादें बेहिसाब। दर्द बांटने को और भी जर्जर
काया वाले हैं। वे खुश तो बिल्कुल नहीं।
निराशा उन्हें भी घेरे हैं। क्या करें
किसी तरह ढांढस बंधा रहे हैं एक दूसरे
का। महिलाओं के लिए यह कष्टकारी समय
है। वृद्धाश्रम में उन्हें वक्त काटने
को विवश होना पड़ रहा है। कुछ
को बेटों ने घर से बेघर किया, कुछ
को बहुओं ने पर दोनों अपने हैं, आज भी।
पता नहीं क्यों भूले नहीं भुलाये जाते। आज उनकी जिंदगी के उन
पलों को लौटा नहीं सकते। ऐसा जरुर
कुछ कर सकते हैं ताकि वे कुछ देर
अपना दर्द भूल सकें।
बुढ़ापा यही चाहता है। वह
सहारा चाहता है, चाहें कुछ पलों का ही क्यों न हो।
यहां सूखा हुआ ऐसा रेगिस्तान हैं
जहां एक बूंद की भी कीमत है।..

मेरी माँ ने झूठ बोल के आंसू छिपा लिया

मेरी माँ ने झूठ बोल के आंसू छिपा लिया




मेरी माँ ने झूठ बोल के आंसू छिपा लिया
भूखी रह भरे पेट का बहाना बना लिया.
.सिर पे उठा के बोझा जब थक गई थी वो
इक घूंट पानी पीके अपना ग़म दबा लिया.

सारा दिन की थी मेहनत पर कुछ नहीं मिला
इस दर्द को ही अपना मुकद्दर बना लिया.
फटे हुए कपड़ों को सीं सींकर है पहनती
ग़मों को फिर आँखों में अपनी छिपा लिया..

कब से अकेली जी रही ख़ुद ही के वो सहारे
उसने तन्हाई को अपना बना लिया..
पता था उसे,आज भी आया नहीं बापू
तो डाकिया से फिर पुराना ख़त पढ़ा लिया..

अगर इस माँ का अब इक आंसू निकल गया
तो मान लेना तुमने अपना सब गवां दिया

मेरा वचपन

मेरा वचपन

 




मेरा वचपन माँ के होते हुये भी बिन माँ के कटी,
 फिर भी मेरी माँ दुनिया कि सबसे अच्छी माँ है मै तो अहसानमंद हूँ,
 कि उनके कारण ही मै इस खुबसुरत दुनिया को देख पाया,,

मुझे बचपन में मेरी उम्र के हिसाब से कुछ ज्यादा ही रोटियां दिया करती थीं
. इंटरवल में सारे बच्चे जल्दी जल्दी खाना ख़त्म करके खेलने चले जाते थे,
. और मै अपना खाना ख़त्म नहीं कर पता था.,
 
 तो डब्बे में हमेशा ही कुछ न कुछ बच जाता था,
, और मुझे रोज़ डांट पड़ती थी. मेरी बहन भी घर आ के शिकायत करती थी,
 कि उसे छोड़ के इंटरवल में मै खेलने भाग जाता हूँ.

एक दिन मेरी बहन मेरे साथ स्कूल नहीं गई,
. मै ख़ुशी ख़ुशी घर आया और दादी को बताया की मैंने आज पूरा खाना खाया है,
. दादी को यकीन नहीं हुआ, उन्होने डब्बा खोला और मुझे दो झापड़ लगा दिए.

फिर दादी बोली की आज तुमने अपना पूरा खाना फेक दिया इसलिए मार पड़ी है,
. मुझे मालूम है की मै तुम्हे ज्यादा खाना देती हूँ,
 और तुम छोड़ोगे ही. लेकिन अगर 4 रोटी में से 2 भी खा ली तो कुछ तो तुम्हारे पेट में जायेगा.
ये दादी का प्यार था.

आज भी जब मै ये बात याद करता हूँ, तो मेरी आँखे भर आती हैं,
, और सोचता हूँ की क्या कभी कोई मुझे इतना प्यार कर पाऐगा.
क्योकि इस दुनिया मे प्यार से खेलने वाले बहूत मिलते है


Saturday, November 2, 2013

दीपावली की दीवानगी…

दीपावली की दीवानगी…

Posted On November - 2 - 2013
भारतीय परिप्रेक्ष्य में दीपावली व्यवसायियों का सबसे प्रिय और महत्वपूर्ण त्योहार है। दीपावली व्यावसायिक समृद्धि और प्रगति का प्रतीक है। यही कारण है कि दीपावली के इर्द-गिर्द उपभोक्ताओं को रिझाने के लिए नए-नए प्रयास किये जाते हैं। फिल्म व्यवसाय से जुड़े लोगों के लिए भी दीपावली नयी उम्मीदों और समृद्धि का संकेत सूचक है। तभी तो दीपावली के इर्द-गिर्द अपनी फिल्म के प्रदर्शन को लेकर निर्माता-निर्देशक एड़ी-चोटी का जोर लगाते हैं। वे वह हर संभव प्रयास करते हैं जिससे उनकी फिल्म दीपावली की छुट्टियों के आस-पास प्रदर्शित हो। दीपावली की दीवानगी फिल्मी दुनिया पर इस कदर हावी है कि दीपावली पर बड़ी फिल्मों का प्रदर्शन एक बड़ा और आकर्षक आयोजन बन गया है। एक आंकलन सौम्या  का।

सपरिवार मनोरंजन

दरअसल, दीपावली के आस-पास के दिन फिल्म व्यवसाय के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल माने जाते हैं। छुट्टियों का माहौल होता है। लोग सपरिवार छुट्टियों का आनंद लेना चाहते हैं। साथ ही,मनोरंजन के लिए पूंजी निवेश करने में भी वे नहीं हिचकिचाते हैं। ऐसे में, संभवत: सपरिवार मनोरंजन के लिए $िफल्में उनके सामने सबसे प्रिय विकल्प के रूप में उभरती हैं। ..और इस तरह दीपावली के इर्द-गिर्द होने वाली छुट्टियों के दौरान अधिकांश लोग सपरिवार सिनेमाघरों का रुख करने लगते हैं। इन्हीं पारिवारिक दर्शकों को रिझाने के लिए दीपावली के दौरान सपरिवार देखी जाने वाली फिल्मों के प्रदर्शन को प्राथमिकता दी जाती है। इस वर्ष दीपावली के अवसर पर कृष 3 के प्रदर्शन की योजना भी इसी आधार पर बनी।  कृष-3 जैसी फिल्में बच्चों को उनके माता-पिता और अन्य रिश्तेदारों के साथ सिनेमाघरों तक खींचने में सक्षम होती हंै। गौर करें तो दीपावली के दौरान प्रदर्शित होने वाली अधिकांश $िफल्में पारिवारिक मनोरंजन को ध्यान में रखकर बनायी जाती हैं।

कमाई की गारंटी

पिछले कुछ अर्से से दीपावली के दौरान प्रदर्शन फिल्म व्यवसाय के लिए सुखद संकेत लेकर आता रहा है। फिल्म-प्रदर्शन के लिए दीपावली को कमाई की गारंटी माना जाने लगा है। इसका अंदाजा इस बात से ही लग जाता है कि एक वर्ष से पूर्व ही निर्माता-निर्देशकों के बीच दीपावली के दौरान अपनी फिल्मों के प्रदर्शन की तारीख सुरक्षित करने की होड़-सी लग जाती है। उदहारण स्वरूप अगले वर्ष दीपावली के दौरान शुद्धि के प्रदर्शन के लिए करण जौहर ने तारीख सुरक्षित कर ली है जबकि अन्य बड़े निर्माता-निर्देशक इस दिशा में अभी से प्रयासरत हैं। रोचक है कि अभी से 2015 की दीपावली के दौरान राजश्री प्रोडक्शन की अपनी नयी फिल्म के प्रदर्शन के लिए सलमान खान तारीख सुरक्षित करने की जुगत लगा रहे हैं। इस सन्दर्भ में ट्रेड विशेषज्ञ तरण आदर्श कहते हैं-सभी आजकल अपनी फिल्म के लिए दीपावली की रिलीज़ बुक करना चाहते हैं। उन्हें यह बखूबी पता है कि इस डेट पर फिल्में रिलीज करना मोटी कमाई की गारंटी है। मेरा मानना है कि इस ट्रेंड में कोई बुराई नहीं है।

शुक्रवार का इंतज़ार नहीं

यूं तो आम दिनों में $िफल्में शुक्रवार को प्रदर्शित होती हैं।.. लेकिन जब दीपावली की बात होती है तो इस मौके को भुनाने के लिए फिल्म निर्माता-वितरक फिल्म को शुक्रवार से पहले भी प्रदर्शित करने में नहीं हिचकिचाते हैं। इस बार भी कृष-3 का प्रदर्शन दीपावली के दिन अर्थात रविवार को होना था,पर बाद में इसे बदलकर दो दिन पहले शुक्रवार कर दिया गया। ऐसा माना जाता है कि दीपावली वाले दिन, शाम और रात के कलेक्शन में थोड़ी गिरावट आ जाती है क्योंकि लोग दीपावली का त्योहार मनाने में व्यस्त हो जाते हैं। यही वजह है कि राकेश रोशन ने कृष-3 को दीपावली के दो दिन पहले प्रदर्शित करने का निर्णय लिया। गौरतलब है कि वर्ष 2008 में दीपावली के दौरान फैशन और गोलमाल रिटन्र्स मंगलवार को प्रदर्शित हुई थी तो 2005 में गरम मसाला और शादी नंबर वन बुधवार को प्रदर्शित हुई।

बड़े सितारों की चांदी

हिंदी फिल्म प्रेमियों के दिलों में उनके प्रिय सितारे बसते हैं। विशेषकर प्रथम श्रेणी के सितारों को लेकर सिनेप्रेमियों में इतना उत्साह रहता है कि वे उन्हीं के साथ सिनेमाघरों में दीपावली मनाना चाहते हैं। प्रशंसकों के इसी प्रेम और उत्साह के कारण बड़े सितारे दीपावली के आस-पास अपनी फिल्म के प्रदर्शन को लेकर उत्सुक रहते हैं। यही वजह है कि बड़े सितारों के लिए दीपावली भाग्यशाली साबित हुई है। हालांकि, शाहरु$ख खान के लिए दीपावली कुछ ज्यादा ही सुखद संकेत लेकर आती रही है। शायद यही वजह है कि शाहरु$ख अगले वर्ष दीपावली के दौरान फराह खान निर्देशित अपनी नयी फिल्म हैप्पी न्यू ईयर के प्रदर्शन की योजना बना रहे हैं।$ खबरों के अनुसार शाहरुख ने फिल्म की निर्देशक फराह खान को इस बारे कहा है।
उधर रणबीर कपूर की निगाहें भी अगले वर्ष की दीपावली पर टिकी हुई हैं। वे अनुराग बसु निर्देशित जग्गा जासूस के प्रदर्शन के लिए अगले वर्ष की दीपावली के दौरान की तारीख सुनिश्चित करना चाहते हैं। यदि रणबीर की ख्वाहिश पूरी हो जाती है तो अगले वर्ष दीपावली की रौनक बढ़ाने के लिए तीन बड़ी $िफल्में शुद्धि, हैप्पी न्यू ईयर और जग्गा जासूस सिनेमाघरों में दस्तक दे सकती हैं।
उम्मीद है कि आने वाले कई वर्षों तक हिंदी सिनेमा यूं ही  दीपावली  के  जगमगाते दीयों से रोशन रहेगा और अपने रंग,ढंग और अंदाज से मनोरंजन के नित नए दीप जलाता रहेगा…।

दीपावली पर प्रदर्शित पिछले दस वर्षों की फिल्में

2012- सन ऑफ सरदार, जब तक है जान
2011- रा.वन
2010- गोलमाल-3,एक्शन रीप्ले
2009- ब्लू, मैं और मिसेज खन्ना,ऑल द बेस्ट
2008- गोलमाल रिटन्र्स,फैशन
2007- सांवरिया, ओम शांति ओम
2006- डॉन, जानेमन
2005- गरम मसाला, शादी नंबर वन
2004- वीर जारा, एतराज
2003- पिंजर, राजा भैया

जश्न-ए-दीपावली

जश्न-ए-दीपावली

Posted On November - 2 - 2013
पर्व दीपावली अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। इस दिन दीपों को प्रज्वलित कर दुनिया को नयी उम्मीदों और नयी ऊर्जा से रोशन करने की घोषणा की जाती है। हिंदी $िफल्मी दुनिया के टिमटिमाते सितारे भी उल्लास और उमंग से यह पर्व मनाते हैं। लाइट, साउंड, कैमरा और एक्शन जैसे संकेत चिह्नïों से दूर दीपावली उन्हें परिवार और दोस्तों के साथ कुछ खुशनुमा पल बिताने का अवसर देती है। ऐसे ही कुछ सितारों की जश्न-ए-दीपावली पर सोम्या की रिपोर्ट।

दीपिका पादुकोण

दीपावली के दिन मैं अपने परिवार के साथ रहना चाहती हूं। सच कहूं तो दीपावली का त्योहार मुझे अपने परिवार के साथ व$क्त बिताने के लिए बेचैन कर देता है। अच्छी बात है कि इस बार दीपावली के दिन मैं अपने परिवार के साथ रहूंगी। दीपावली मेरा सबसे प्रिय त्योहार है। बचपन से ही मैं दीपावली सेलिब्रेशन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती रही हूं। मम्मी और छोटी बहन के साथ दीये जलाना मुझे बेहद पसंद है। हम सब  एक साथ मिल कर दीपावली की शाम को लक्ष्मी पूजा करते हैं। मुझे और मेरी बहन को हमारे पेरेंट्स ने हमेशा से बताया है कि पटाखे पर्यावरण के लिए हानिकारक होते हैं  इसलिए हम कभी पटाखे नहीं जलाते। बचपन में भी छोटे- मोटे  पटाखे ही जलाते थे। दीपावली के दिन मेरे लिए सबसे खास होते हैं  मां के हाथों से बने कुछ खास व्यंजन और मिठाइयां।

बिपाशा बसु

मुंबई में अपने परिवार और रिश्तेदारों की कमी सबसे अधिक मुझे दीपावली के दिन ही खलती है। मेरे ज्यादातर रिश्तेदार बंगाल में रहते हैं इसलिए दीपावली के दिन उनसे मिलना नहीं हो पाता है। दीपावली के कुछ दिन पहले बड़े पैमाने पर घर की सा$फ-सफाई  करती हूं। ऐसा करने से दीपावली के दिन होने वाली साज-सज्जा और भी $खूबसूरत लगती है । पटाखे मैं बिलकुल नहीं जलाती हूं। लक्ष्मी-गणेश की पारंपरिक पूजा के बाद रसगुल्लों का स्वाद लेती हूं। दीपावली के दिन की सबसे अच्छी बात है कि इस दिन हम सब गिले-शिकवे भूलकर एक-दूसरे को याद करते हैं और सबकी $खुशी की कामना करते हैं।

रणवीर सिंह

दीपावली का मतलब मेरे लिए फैमिली और फ्रेंड्स के साथ क्वालिटी टाइम बिताना है। मैं दीपावली के दिन होने वाले जुए को पसंद नहीं करता इसलिए दीपावली की पार्टी मुझे बोरिंग लगती है। उस दिन मुझे अपनी फैमिली के बच्चों के साथ खेलना ज्यादा अच्छा लगता है। मुझे पटाखे पसंद नहीं हैं।  दीपावली के बारे में एक बात जो बहुत पसंद है…वह है चारो-तरफ दिखते मुस्कुराते चेहरे। सभी रिलैक्स और खुश नजर आते हैं। दीपावली बिजी शेड्यूल के बीच सेलिब्रेशन का मौका देती है। वैसे  मेरे लिए  दीपावली की सबसे बड़ी हाईलाइट मिठाइयां हैं।

सोनम कपूर

मैं बचपन से बेहद फेस्टिव रही हूं। खासकर दीपावली के लिए बेहद उत्साहित रहती हूं। दीपावली के दिन अक्सर घर की साज-सज्जा की जिम्मेदारी मुझे दी जाती है। मम्मी के साथ मिलकर रंगोलियां बनाती हूं। मुझे दीपावली के दिन दीये से अपने घर को रोशन करना ज्यादा अच्छा लगता है। मोमबत्तियों का हम कम-से-कम इस्तेमाल करते हैं। मुझे तेज आवाज वाले पटाखे पसंद नहीं हैं, रॉकेट और फुलझडिय़ों से ही दीपावली मनाती हूं।  दीपावली रोशनी का त्योहार है, शोर का नहीं। पारंपरिक माहौल में हम दीपावली मनाते हैं।

अनुष्का शर्मा

मैं त्योहारों के दौरान ज्यादा उत्साहित नहीं होती हूं। मेरे लिए दीपावली का दिन दूसरे दिनों की तरह नॉर्मल ही रहता है। ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि मैं बचपन से दीपावली सेलीब्रेशन की तैयारियों में सम्मिलित नहीं रही हूं। मम्मी हमेशा दीपावली के लिए सारी तैयारियां करती हैं। मैंने कभी दीपावली के लिए कुछ नहीं खरीदा है। बचपन में पटाखे फोड़े हैं। बड़े होने के बाद वह भी छूट गया। हां, मेरी कोशिश रहती है कि दीपावली के दिन अपने घर वालों के साथ समय बिताऊं।

रितिक रोशन

दीपावली के आसपास हमारी सिटी बेहद पॉल्यूटेड हो जाती है। मुझे लगता है कि दीपावली के दिन होने वाले पॉल्यूशन के विषय में हमें सोचना चाहिए। पटाखे फोडऩे से ज्यादा पॉल्यूशन होता है। हवा में पटाखों के हानिकारक टुकड़े फैल जाते हैं। मेरी कोशिश रहती है कि बम और पटाखों की तेज आवाज से दूर कहीं शांत और सुकून वाली जगह पर दीपावली मनाऊं। इस बार दीपावली का सेलिब्रेशन मेरे लिए खास है क्योंकि मेरी फिल्म कृष3 रिलीज़ हुई है। उम्मीद है कि मेरे और दर्शकों के लिए कृष3 दीपावली सेलिब्रेशन को और खुशनुमा बनाएगी।

कैसे मनाती हैं दीवाली टीवी सीरियल की रानियां

कैसे मनाती हैं दीवाली टीवी सीरियल की रानियां

Posted On November - 2 - 2013
संगीता
दीवाली एक ऐसा त्यौहार है जिसकी  खुशी कुछ निराली है। हर कोई इसे अपने ढंग से मनाता है लेकिन जिनको हम अच्छे से जानते हैं उनके हर काम पर हमारी नजर रहती है। हमारे ऐसे ही जानने  वालों में आजकल टीवी अभिनेत्रियां  का नाम भी शामिल हो गया है। उन्हें हर रोज  अपने ड्राइंग रूम या बेडरूम में देखते-देखते उनके साथ कुछ ऐसा रिश्ता बन गया है कि वे अपने परिवार का हिस्सा सा ही लगती है। दर्शकों के दिल पर राज करने वाली ये टीवी सीरियल की रानियां दीवाली कैसे मनाती हैं, यह जानने की कोशिश हमने की। किसने दीवाली को लेकर क्या कहा आइये बताते हैं आपको : -
प्रत्युषा बनर्जी
इन दिनों प्रत्युषा बिग बास के घर में है। उम्मीद है वह दीवाली से पहले घर से बेघर नहीं होगी। इस कारण उसकी दीवाली बिग बास के घर में ही मनेगी। लेकिन पिछली बार जब वह ‘बालिका वधू’ की आनंदी के रूप में काम कर रही थी, तब उसकी दीवाली बेहद शानदार रही थी। प्रत्युषा बताती है कि गणेशजी,लक्ष्मीजी और काली मां की मूर्तियों के लिए दीवाली पर हर साल  एक छोटा सा दीवाली घर बनाती हूं। साथ ही दीवाली पर हर साल अपने लिए 3 ड्रेस खरीदती हूं जिन्हें मैं धन तेरस, छोटी दीवाली और बड़ी दीवाली तीनों दिन नए कपडे पहन सकूं। यह सिलसिला मेरी मां ने मेरे लिए मेरे बचपन में शुरू किया था पर अब मैं अपने और अपने परिवार के  लिए  खुद कपडे खरीदती हूं लेकिन  मैं पटाखे जलाने में बहुत सावधानी बरतती हूं क्योंकि बचपन में दीवाली पर मेरा  पैर जल गया था।
अविका गौर
अविका गौर इन दिनों ‘ससुराल सिमर का’ सीरियल से चर्चा में है लेकिन बाल आनंदी के रूप में अविका ने अपने काम से लोगों का जैसा दिल जीता, वह अनुपम था। अविका कहती है— मैं दीवाली का पूरे साल इंतजार करती हूं,मेरे लिए साल में यदि सबसे बेस्ट समय कोई है तो वह दीवाली है। धनतेरस से भैया दूज तक त्यौहार का लम्बा समय जीवन में नया उत्साह भर देता है। एक यही मौका है जब सारा परिवार इकट्ठा होता है। सब एक दूसरे को गिफ्ट देते है। घर में दिए जलते है। जब मैं पूरा शहर एक साथ  जगमग रौशनी से नहाया देखती हूं तो मन खिल उठता है। दीवाली पर मैं नए कपडे खरीदती हूं, थोड़े बहुत पटाखे भी जलती हूं और मिठाई तो खाती ही हूं।
 दीपिका सिंह
सीरियल ‘दिया और बाती’ के अपने संध्या के रोल से से टीवी स्टार बन चुकी दीपिका सिंह भी दीवाली की बात करते चहक सी उठती है। वह कहती हैं— बहुत ही दिलकश उत्सव है  दीवाली। मेरा सबसे फेवरिट फेस्टिवल। दीवाली  में जो बात मुझे सबसे अच्छी लगती है वह है इसकी चमक दमक जिसमे भक्ति और आनंद के खूबसूरत रंग भरे हुए है। इस चमक दमक में शामिल होने के लिए मैं भी इस दिन खूब चमकने दमकने की कोशिश करती हूं। नए कपड़े खरीदना तो सबसे बड़ा अधिकार सा ही हो जाता है इस दिन,फिर बाकी साल में मिठाई खाओ या नहीं इस दिन मिठाई भी बिना रोक टोक और बिना सोचे समझे मजे मजे में खाती हूं। गणपति बाबा और महालक्ष्मी की पूजा का इस दिन तो अलग ही सुख मिलता है। अपने परिवार, दोस्त यहां तक कि पड़ोसियों से भी इस दिन मिलना जुलना हो जाता है और एक दूसरे से गिले शिकवे भी दूर किये जा सकते हैं।
 
दीपिका सेमसन  
‘ससुराल सिमर का’ की  सिमर यानी दीपिका सेमसन  भी दीवाली को पसंद तो करती है और इसे मनाती भी है लेकिन दीवाली का शोर उसे विचलित भी करता है। दीपिका कहती है— मुझे दीवाली क्रिसमस दोनों ही पसंद है। लेकिन मुझे यह डर लगा रहता है कि कहीं अनार या कोई बड़ा बम कोई अप्रिय घटना को आमंत्रित ना कर दे।
इसलिए मैं इनका बहुत कम और सावधानी से इस्तेमाल करती हूं। हालांकि रॉकेट की तो आवाज से ही मुझे बहुत डर लगता है और उसके शोर से बचने के लिए मैं इयर प्लग लगा लेती हूं। मैं चाहती हूं दीवाली शोर मुक्त हो तो ज्यादा बेहतर होगा। हां दीवाली पर नए कपड़े पहन घर को  रौशनी से सजाना और मिठाई खाना तथा लोगों से मिलना जुलना मुझे सुहाता है।

Wednesday, October 30, 2013

कुछ कहती है करवा चौथ

व्रत, त्योहार, उत्सव भागते जीवन में ठहराव लाते हैं और ठहरे जीवन में गति। हर त्योहार अलग ऋतु, अलग प्रयोजन और अलग कहानी लिए होता है। दशहरा असत्य पर सत्य, दीपावली विजयी और बिछुड़ों के स्वागत, होली मेल-मिलाप तो क्रिसमस और ईद कुर्बानी की सीख का भाव लिए हैं। जबकि करवा चौथ एक ही दिन में वे सारे भाव लिए है, जो हर त्योहार अलग-अलग। इसमें पति के लिए पत्नी की त्याग भावना भी है और शाम को लौटे पति के स्वागत का भाव भी है। इस त्योहार में निराहार रहकर इंद्रियजीत का तप भी है और तमाम मतभेदों को भुलाकर फिर मेल-मिलाप से रहने की सीख भी।

करवा चौथ यानी पत्नी पति के लिए पूरा दिन निर्जल-निराहार रहकर व्रत करे
चन्द्र भगवान को अघ्र्य देकर उसकी सलामती की प्रार्थना करे, लेकिन अगले दिन...? फिर से वही रूठना-मनाना, कभी बच्चों को लेकर किच-किच तो कभी कुछ और। करवा चौथ के दिन उमड़ा प्यार 24 घंटे बाद ही कहां गायब हो जाता है? ऎसे में करवा चौथ का यह त्योहार अपने नाम में लगे चौथ शब्द को सार्थक करते हुए चार बड़ी सीखें दे देता है, जो हर दंपती अपने जीवन में उतार ले तो करवा चौथ का यह प्यार हमेशा-हमेशा के लिए बना रहा।


स्व-नियंत्रण
भले ही निराहार रहने से दिन-भर काम के लिए शारीरिक ऊर्जा में कमी आ रही हो, प्यासे रहने से प्राण कंठ में अटके हों, इस दिन का पवित्र भाव स्व-नियंत्रण की शक्ति देता है। पति की भलाई के लिए सारे कष्ट छोटे नजर आते हैं। ऎसा भी होता है, जब पत्नी रूग्ण है या चोटिल है, चिकित्सकीय देख-रेख में है या गर्भवती है, लेकिन ऎसे में भी वह इस दिन को नहीं भूलती। कहां से आती है ऎसी भाव-शक्ति? मन के भीतर जमा ऎसा कौन-सा विश्वास और आस्था है जो उसे भूख-प्यास भुलाए रखती है? असल में पति की मंगल कामना का भाव ही उसे खुद पर नियंत्रण रखने की शक्ति देता है।


मतभेद भले हों, मनभेद न हों
हर विचारशील मस्तिष्क को अपने स्वतंत्र विचार रखने का प्राकृतिक अधिकार है, लेकिन साथी की इस स्वतंत्रता का अतिलंघन न हो। भारतीय संस्कारों ने हमें कुछ इस तरह गढ़ा है कि पति-पत्नी के बीच कितनी ही अनबन हो, पत्नी करवा चौथ के इस व्रत को कभी नहीं भूलती। पति से लाख झगड़े भी उसे इस व्रत को करने से रोक नहीं पाते और इस व्रत के बाद शाम को रूठे पति का मानना भी तय है, भले बोलचाल कई दिनों से बंद हो। कहां चला जाता है कई दिन का गुस्सा? जब तमाम मतभेद एक दिन के लिए भुलाए जा सकते हैं तो तमाम उम्र के लिए क्यों नहीं?

समर्पण
पूर्णतया पति को समर्पित होने का भाव ही करवा चौथ है। दुनिया में सिर्फ वही है, जिसके लिए आपने सुख-दुख, भूख-प्यास, किसी को नहीं देखा। रोज यह समर्पण कहां गायब हो जाता है? समर्पित होने का मतलब यह भी नहीं है कि आप उनकी सारी बातें मानें, भले ही वे कितनी ही गलत हों, लेकिन उनका विरोध झगड़े या जिद की बजाय किसी और तरीके से करने की कोशिश करें।


प्रसन्नता की तलाश
इस दिन आप भूखी-प्यासी हैं, फिर भी खुश हैं। सभी चीजों या साधनों की प्राप्ति का एक ही उद्देश्य है, वह है मन की संतुष्टि। करवा चौथ के रोज आपने संतुष्टि का यह भाव अपने में भर रखा है। साधनों या चीजों की कमी या उनके न होने से भी आज आपको कोई फर्क नहीं पड़ रहा। प्रसन्नता की तलाश संतुष्टि पर खत्म होती है। ऎसे में करवा चौथ की चौथी सीख यही है कि अगर प्रसन्नता की तलाश में आप हैं तो जीवन से संतुष्ट होना सीखना होगा।


बस दो मिनट
ये चारों सीखें, जो यह पर्व हमें सिखाता है, अगर इन्हें चिरस्थायी बना लिया तो हमारा हर दिन, हर पल उमंग भरा, सोद्देश्य और त्योहारी उल्लास से भरा होगा। इसके लिए रोजाना दैनिक दिनचर्या से पहले चाहिए केवल दो मिनट। प्रात: काल उठने के बाद सबसे पहले आंख बंद कर ध्यान मुद्रा में बैठें और फिर...पहले मिनट सोचें
किन बातों को करने से आपका आज का दिन ज्यादा निकटताभरा हो सकता है?
छोटी-छोटी चीजें, जो एक दूसरे के लिए की जा सकती हैं, जैसे गाड़ी ही साफ कर दी, एक को ऑफिस के लिए देर हो रही हो तो दूसरे ने तुरंत घर की सफाई कर दी। उस दिन पहने जाने वाले एक-दूसरे के जूते-चप्पल निकाल कर, पॉलिश करके रख दिए। पत्नी को दफ्तर में देर हो रही है तो खाने की कुछ तैयारी कर दी या बच्चों का होम वर्क करवा दिया। ऎसे तमाम कई तरह के काम हैं, जो होते तो बहुत छोटे हैं, लेकिन कर दिए जाएं तो काफी मायने रखते हैं।
दोनों कामकाजी हैं और काम को लेकर चिक-चिक है तो फिर आज सुबह ही यह तय कर लेंगे कि किसको क्या करना है।
दोनों सुबह की चाय हर हाल में साथ पिएंगे।
एक पल के लिए दोनों एक दूसरे का हाथ थामेंगे और कुछ सेकंड्स के लिए ही सही, एक दूजे को प्यार भरी नजरों से देखेंगे।
दोनों आज एक-दूसरे की पसंद के कपड़े पहनेंगे और वह भी बिना एक दूसरे को बताए।
किसी गलत काम के लिए कल एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराया था, वो गलतफहमी आज दूर करने की कोशिश करेंगे।
दूसरे मिनट सोचें
आज क्या न करने से दोनों का मूड ठीक रखा जा सकता है?
कल बच्चों, साफ-सफाई या जिस किसी बात को लेकर झगड़ा हुआ। वह झगड़ा आज के दिन पर हावी नहीं होने देंगे।
अगर एक-दूसरे की कोई आदत पसंद नहीं है, तो कम से कम आज पूरे दिन उसकी बुराई करना छोड़ेंगे।
और बस दिनचर्या में इन बातों को ढाल लें। फिर देखिए, करवा चौथ का यह प्यार कैसे हर दिन बरकरार रहता है।

अंधियारा भागा... लो आई दिवाली

जब आसमान में अमावस का गहरा अंधेरा छाया होता है, तब रोशनी की जगमग और खिलखिलाहट के साथ धरती पर उजाले की बरसात होती है। जब चांद का कहीं अता-पता नहीं होता, उस समय सोने-चांदी, मिट्टी, पीतल, तांबे के घी-तेल से भरे दीए पूरे देश को जगमग करते हैं। मोमबत्तियां रोशनी बिखेरती हैं। रंग-बिरंगे बल्बों की लडियों से हर दीवार, कोना रोशन होता है। घर-दरवाजे रंगोलियों से सजे रहते हैं। बंदनवार लगाए जाते हैं। लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां साथ सजती हैं। लक्ष्मी के साथ गणेश की पूजा का अर्थ भी शायद यही है कि लक्ष्मी प्राप्त करने के लिए जो बुद्धि चाहिए, उसे गणेशजी प्रदान करें और धनवान बनने की राह में जो विघ्न बाधाएं आएं, उन्हें भी दूर करें, आखिर विघ्न विनाशक जो ठहरे।


पूड़ी, पकवान, छोले-भठूरे, मिठाइयों, फलों, नमकीन तरह-तरह की चॉकलेट, बिस्कुटों से घर महक रहा है। फूलों की मालाएं और अन्य तरह की सजावट से घर की रंगत ही बदल गई है। वैसे तो इस अवसर पर घर का क्या-क्या नहीं बदला है। देखा जाए तो दिवाली और सफाई का गहरा सम्बन्ध है। लक्ष्मी के स्वागत के लिए घर के कोने-कोने को चमकाना जरूरी है। हर दीवार की ताजगी और चमक बता रही है कि अभी-अभी रंग-रोगन की कूचियां इन पर से होकर गुजरी हैं। परदों, कुशन कवर, सोफा कवर ने इन दीवारों की रंगत में और चार-चांद लगा दिए हैं, क्योंकि वे भी तो नए हैं। सफाई का सम्बन्ध बहुत गहरे हमारे से जुड़ा है। अगर हम और परिवार के सभी सदस्य स्वस्थ, प्रसन्न रहें, अपने कामकाज में मेहनत से लगें, तो यह मेहनत परिणाम भी लाती है और यह परिणाम धन अर्थात् लक्ष्मी के रूप में ही हमारे सामने आता है। घर के सामने नए मॉडल की बड़ी कार खड़ी है। घर के कई लोगों ने अपना मोबाइल भी बदला है। मोबाइल और कार बदलने की जिद और चाहत घर के छोटे सदस्यों की रही है। इन दिनों कार, मोबाइल और कम्प्यूटर के चुनाव में ये नन्हे सदस्य परिवार के बड़ों से आगे हैं। इन नन्हे-मुन्नों में बहुतों ने अपने लिए प्ले स्टेशंस भी खरीदे हैं। तरह-तरह की मशहूर ब्ा्रांड्स के कपड़े भी उनकी अलमारी में सजे हैं। घर की महिलाओं ने भी मनपसंद खरीदारी की है। दिवाली तो है ही, साथ में गोवर्धन और भैयादूज भी तो है। धनतेरस के दिन के लिए नए बरतन तो पहले ही खरीद लिए गए हैं।


नई कारों, मोबाइल, जेवरों, कपड़ों, खिलौने, ब्ा्रांडेड कपड़ों, कॉस्मेटिक्स, जूते-चप्पल, नमकीन, खील-बताशों, मीठे सेवों, नमकपारों से बाजार भरे पड़े हैं। अधिकांश उत्पादों पर भारी-भरकम छूट मिल रही है। मेहंदी वाले और ब्यूटी पालर्स ओवरबुक्ड हैं। मेहंदी और पार्लर वाले कई गुना अधिक फीस पर घर आने को तैयार हैं। कई जगहों पर दिवाली के स्पेशल ऑफर के नाम पर छूट भी मिल रही है। अक्सर खरीदार और विके्र ता दिवाली का इंतजार करते हैं। मिठाई की दुकान पर इतनी भीड़ है कि दो घंटे में भी नम्बर आ जाए तो बड़ी बात होगी। पटाखों की दुकानों पर भी भीड़ है। हालांकि कहते हैं कि "से नो टू क्रैकर्स कैंपेन" का पटाखों की बिक्री पर असर पड़ा है। जब से मोबाइल का चलन बढ़ा है, ग्रीटिंग्स मोबाइल पर ही भेजे जाते हैं। इतने मैसेज होते हैं कि नेटवर्क जाम हो जाता है। मोबाइल कंपनियां भी मौके का लाभ उठाने के लिए मैसेज के रेट बढ़ा देती हैं। पिछले कुछ सालों से दिवाली के अवसर पर चॉकलेट की बिक्री में भी भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। बाजार में, मॉल्स में, सिनेमा हॉल्स में भारी भीड़ है। दिवाली के मौके के इंतजार में कई फिल्म वाले अपनी फिल्म रिलीज करने को बैठे थे। दिवाली माने छुट्टी, छुट्टी माने ज्यादा दर्शक और फिल्म हिट। रेलगाडियों, बसों में पैर रखने के लिए जगह नहीं है। जितनी टिकट्स का रिजर्वेशन है, उससे कई गुना लोग गाडियों में सवार हैं। लोग अपने-अपने घर जा रहे हैं। दिवाली का मौका जो है। रेस्टोरेंट, होटल्स की बुकिंग महीनों पहले की जा चुकी है। आखिर खुशी का मौका जो है। एक-एक जगह कई-कई पार्टीज का आयोजन है। युवा वर्ग भी पीछे नहीं है। बहुत-सी जगहों पर दिवाली मेले लगे हैं। कुछ लोग कहते हैं कि त्योहारों में अब पहले जैसी बात नहीं रही। दिखावा बढ़ा है, हार्दिकता कम हुई है। शुभकामना संदेशों में भी औपचारिकता ज्यादा रह गई है। दिल से दिल की बात में कमी आई है।


मौका है उत्सव का
वैसे इन दिनों त्योहार का मतलब "ईट, ड्रिंक एंड मैरी" ही रह गया है, लेकिन युवा वर्ग की मानें तो छुट्टी और त्योहार का मतलब ही आनंद और मौज-मस्ती है। इन दिनों युवाओं की नौकरियों का जो आलम है, उसमें वे 15 से 18 घंटे तक काम करते हैं। काम के वक्त उन्हें सांस लेने की भी फुरसत नहीं होती। ऎसे में जब कोई उत्सव मनाने का मौका आता है, तो वे रूटीन से हटकर उसे भरपूर जीना चाहते हैं। उत्सव मनाना, अपनी रोजमर्रा की जिंदगी की परेशानियों को हल करने, उनसे दूर जाने का एक आसान तरीका भी है। वैसे भी जब किसी को कोई बड़ी खुशी मिलती थी या कोई खास मौका होता था तो कहते थे, आज तो दिवाली हो रही है।

बहने बांध रही भाई की कलाई पर स्नेह की डोर


बहने बांध रही भाई की कलाई पर स्नेह की डोर


भाई-बहन के रिश्तों में मिठास घोलता रक्षाबंधन का त्योहार जहां मंगलवार को खुशियों का संचार करता नजर आया वहीं देश के कुछ हिस्सों में बुधवार को भी बहनों ने भाई की कलाई पर स्नेह की डोर बांधी। इस बार राखी बांधने का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त भद्रा समाप्ति के पश्चात रात आठ बजकर 48 मिनट से नौ बजकर दस मिनट तक रहने के कारण जहां कई लोगों ने इस समय का इंतजार किया जबकि दिन में भी लाभ एवं अमृत के चौघडिये में राखी बांधने की होड़ रही। बुधवार को भी शुभ मुहूर्त होने के कारण रक्षा बंधन त्योहार मनाया जा रहा है।

भाई-बहन के रिश्ते को अटूट बनाने वाले इस त्योहार का उल्लास अब भी छाया हुआ है। त्योहार की रौनक घरों बाजारों तक नजर आ रही है। बहने अपने भाइयों की कलाई पर उनके सुख-समृद्धि की कामना करते हुए राखी बांध रही है वहीं भाई अपनी बहनों को खूबसूरत गिफ्ट देते हुए उनकी खुशी को दुगुना कर रहे हैं।

सोशल साइट्स पर भी राखी की धूम

इतना ही नहीं, राखी के त्योहार की खुशी और शुभकामनाओं का दौर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी छाया हुआ है। इस हाइटेक युग में जहां बहनों ने अपने भाइयों को सोशल साइट्स के जरिए राखी के ई-ग्रीटिंग्स भेज रहे हैं, वहीं भाइयों ने भी सोशल साइट्स के जरिए अपनी बहनों को शुभकामनाएं भेजी हैं। फ्रैंड्स भी फेसबुक, ट्वीटर आदि के जरिए एक-दूसरे को राखी की शुभकामनाएं दे रहे हैं। राखी की शुभकामनाओं के एसएमएस भेजने का सिलसिला अब भी जारी है।

मुहूर्त को लेकर रहा उहापोह

धर्मशाçस्त्रयों ने 20 अगस्त को भद्रा के पश्चात रात 8.32 बजे के बाद ही त्योहार मनाने को शास्त्र-सम्मत है। इसे लेकर लोगों में ऊहापोह की स्थिति बनी रही। उदया तिथि को देखते हुए अंतत: 21 अगस्त को ही रक्षाबंधन मनाने का लोगों ने निश्चय किया। कुछ इक्का-दुक्का स्थानों पर ऊहापोह के बीच मंगलवार को ही रक्षा बंधन मनाया ग


विदेश में भी मनाया जाता है रक्षाबंधन

भाई-बहन के बीच अटूट बंधन का प्रतीक रक्षाबंधन देश ही नहीं विदेशों में भी अलग अलग तरीकों से मनाया जाता हैं। सावन की पूर्णिमा पर मनाये जाने वाले रक्षाबंधन को भारत ही नहीं पाकिस्तान, नेपाल एवं मॉरीशस के कुछ हिस्सों में भी बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता हैं।


नेपाल में राखी का त्योहार सावन की पूर्णिमा को मनाया जाता है, लेकिन नेपाल में राखी को जनेऊ कहा जाता है और इस त्योहार को जनेऊ पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इस दिन घर के बड़े लोग अपने से छोटे लोगों के हाथों में एक पवित्र धागा बांधते हैं। राखी के अवसर पर यहां एक खास तरह का सूप पिया जाता है जिसे कबाती कहा जाता है।


इसी तरह देश के पूर्वी राज्य उड़ीसा में राखी को नमहा पूर्णिमा के नाम से मनाया जाता है। इस दिन लोग गायों और बैलों को सजाते हैं और एक खास तरह की मिठाई और पीठा बनाते हैं जिसे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों में बांटा जाता है। इस दिन राधा कृष्ण की प्रतिमा को झूले पर बैठाकर झूलन यात्रा भी निकाली जाती है।


इसी तरह महाराष्ट्र, गुजरात और गोवा में राखी को नराली पूर्णिमा के नाम से मनाया जाता है। इस दिन नारियल को समुद्र देवता को भेंट किया जाता है। समुद्र देवता को नारियल चढ़ानेे के कारण ही इसेे नराली पूर्णिमा कहा जाता है।

उत्तराखंड के कुमाऊ इलाके में रक्षाबंंधन को जानोपुन्यु कहा जाता है। इस दिन लोग अपने जनेऊ को बदलते हैं। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, बिहार और झारखंड में इसे कजरी पूर्णिमा कहा जाता है। यह किसानों और महिलाओं के लिए एक खास दिन होता है।


गुजरात के कुछ हिस्सों में रक्षाबंधन को पवित्रोपन के नाम से मनाया जाता है। इस दिन गुजरात में भगवान शिव की पूजा की जाती है। पश्चिम बंगाल में रक्षाबंधन को झूलन पूर्णिमा के नाम मनाया जाता है। इस दिन भगवान कृष्ण और राधा की पूजा की जाती है साथ ही महिलाएंं अपने भाईयों के अच्छे जीवन के लिए उनकी कलाइयों पर राखी बांधती हैं।

इस त्योहार के शुरूआत का ठीक से कहीं वर्णन नहीं मिलता लेकिन भविष्य पुराण के अनुसार देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानवों के हावी होने से भगवान इन्द्र घबराकर बृहस्पति के पास गए और वहां बैठी इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने मंत्रों की शक्ति का रेशम का धागा इंद्र की कलाई पर बांध दिया। इससे इंद्र दानवों की लड़ाई में विजयी हुुए।


उस दिन श्रावण पूर्णिमा का दिन था और यह माना जाता हैं कि तभी से धागा एवं राखी बांधने की प्रथा चली आ रही हैं। इसी तरह रक्षा बंधन का संबंध सिन्धुघाटी सभ्यता से जुड़ा भी मानते हैं और कहा जाता हैं कि यह परम्परा छह हजार साल पुरानी हैं।

इसी प्रकार मध्यकालीन युग में राजपूत एवं मुगलों के बीच संघर्ष के समय गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से बचने का कोई रास्ता नहीं निकलता देख राजस्थान में चित्तौड़गढ़ के राजा की विधवा रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजी और हुमायूं ने उसकी रक्षा कर उसे बहन का दर्जा दिया। इसी तरह रक्षा बंधन के कई साक्ष्य इतिहास में दर्ज हैं।

Raksha Bandhan Special - बहना के संग

सारी उमर बहना के संग रहना है

 

भाई-बहन के बीच महज धागे बांधने की रस्म नहीं बल्कि प्यार व खुशियों का त्यौहार है, रक्षाबंधन। ऎसे ही नाजुक धागे पर टिके होते हैं रिश्ते भी। भाई-बहन के अटूट बंधन को दर्शाने वाला यह रिश्ता भले एक रिश्ते को मजबूती देने के रिवाज को आगे बढ़ता है, लेकिन इस पर्व की गहराई में जाएं तो यह एक दूसरे के प्रति लगाव को बढ़ाने का भाव दर्शाता है।

प्रेम की इस बयार की खुशबू को फैलाना का काम बॉलीवुड फिल्मों ने भी बखूबी किया है। तभी तो रक्षाबंधन आते ही याद आ जोते हैं वे अनमोल तराने, भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना, फूलों का तारों का सबका कहना है एक हजारों में मेरी बहना है...जो रिश्ते के बंधन को और प्रगाढ़ बनाने का काम करते हैं।


हमारे देश में रिश्तों और फिल्मों का बहुत गहरा संबंध हैं। फिल्में हमारी जिंदगी का आईना होती हैं। इनका हमारे जीवन में इतना प्रभाव है कि रीयल लाइफ को इससे जोड़कर देखना पसंद करते हैं। हिंदी सिनेमा में हर पर्व-त्यौहार पर फिल्में व गाने बनाए गए हैं। समय-समय पर बनी रिश्तों के ताने-बाने को बुनने वाली इन फिल्मों ने दर्शकों, त्यौहारों व सिल्वर स्क्रीन को भी आपस में जोड़ कर रखा है।

राखी के अवसर पर हम ऎसे ही खूबसूरत गीतों और उनमें दर्शाए गए रिश्तों पर फोकस करने वाली एक कहानी बुन रहे हैं।


छोटी बहन (1959)

इस फिल्म में एक्ट्रेस नंदा अपने भाई बलराज साहनी के साथ राखी सेलेब्रेट करती है। फिल्म का एक सीन जिसमें नंदा, बलराज साहनी और रहमान होते हैं। बीच मे राखी से सजी थाली रखी होती है और वह दोनों का हाथ पकड़े हुए होती है। इस फिल्म में भाई बहन पर फिल्माया गया गाना आज भी फैंस की जुबां पर सुनने को मिलता है।

सॉन्ग : भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना...


अनपढ़ (1962)

बलराज साहनी व माला सिन्हा स्टारर फिल्म (अनपढ़) में भाई बहन के रिश्ते को बहुत ही प्रभावित ढंग से पेश किया गया। इसमें माला ने बलराज की बहन को रोल अदा किया। एक दृश्य के दौरान माला सिन्हा अपने भाई को राखी बांधकर उसकी आरती उतारती है। यह इस फिल्म का बहुत ही इम्प्रेसिव सीन है। इसमें भाई बहन के रिश्ते को लेकर एक गाना भी फिल्माया गया।

सॉग : रंग बिरंगी राखी लेकर आई बहना, राखी बँधवा लो मेरे वीर रे...


अंजाना (1969)

राजेन्द्र कुमार, बबीता स्टारर इस फिल्म में राजेन्द्र अपनी बहन की ओर देखता रहता है। बहन हाथ में राखी से सजी थाली लिए हुए होती है। वह अपने भाई को बताती है कि उसकी लाइफ में उसका बहुत महत्व है। उसके बिना उसका जीवन अधूरा है।

सॉन्ग : हम बहनों के लिए ऎसा पर्व आता है इक दिन साल में...


बेईमान (1972)

मनोज कुमार स्टारर यह फिल्म भी भाई बहन के प्यार को बखूबी बयां करती है। मनोज अपनी बहन से राखी बंधवाते हैं। दोनों बहन-भाई राखी की ओर एकटक लगाकर देखते रहते हैं। इस फिल्म में राखी के बंधन की तुलना चांद और किरण से की गई है।

सॉन्ग : ये राखी बंधन है ऎसा, जैसा चांद और किरण का...


रेशम की डोरी (1974)

फिल्म के टाइटल से प्रतीत होता है फिल्म रक्षाबंधन पर आधारित है। सायरा बानो, धर्मेन्द्र स्टारर यह फिल्म बहुत ही इमोशनल है। फिल्म के कई सीन दर्शकों बहुत भावुक करते हैं। इस फिल्म का राखी के अवसर पर फिल्माया गीत बहुत ही पॉपुलर है।

सॉन्ग : बहना के भाई की कलाई पर प्यार बाँधा है...


चंबल की कसम (1980)
मनोज कुमार स्टारर फिल्म में बहन चांद के जरिए भाई को संदेश भेजती है। वह चांद को कहती है मेरे भाई से कहना बहन तुझे याद कर रही है। गाने के जरिए फिल्म में पेश किया गया दर्शकों के बीच यह संदेश काफी सराहा गया।

सॉन्ग : चंदा रे, मेरे भैया से कहना, बहन को याद करे...


प्यारी बहना (1985)

इस फिल्म में तन्वी आजमी ने मिथुन चक्रवर्ती की बहन को रोल अदा किया। एक सीन के दौरान तन्वी हाथ में थाली लिए हुए होती है। तिलक लगाकर लगाकर आरती उतारती है। मिथुन मुस्कराते हुए बहन से राखी बंधवाते हैं। इसमे फिल्माया गया यह सीन दर्शकों के दिल को छु लेता है।

सॉन्ग : ओ मेरे प्यारी बहना, मैं तेरे भैया भी, मै तेरी मय्या भी, बाबुल भी हूं मैं तेरा...


प्यार किया तो डरना क्या (1998)
यह फिल्म आज भी प्यार भाई बहन के प्यार की मिसाल पेश करती है। इसमें काजोल और अरबाज खान पर फिल्माया राखी का सीन दर्शकों काफी प्रभावित करता है। काजोल को अरबाज के तिलक लगाते जो सीन फिल्म में पेश किया गया है उससे देखकर हर भाई को अपनी बहन और प्रत्येक बहन को अपने भाई की याद आ जाती है।

हरे रामा हरे कृष्णा (1971)
देवआनंद, जीनत अमान और मुमताज जैसे बड़े सितारों से सजी इस फिल्म में राखी का सीक्वेंस भले नहीं फिल्माया गया हो, लेकिन फिल्म के गीत ने भाई बहन के रिश्ते को इतना मजबूत बनाया कि इससे खूबसूरत गीत इस रिश्ते पर आज नहीं बना। लता मंगेशकर का गाया यह गीत अब तक कानों में रिश्तों की मिठास को घोलता है।

सॉन्ग : फूलों का तारों को सबको कहना है, एक हजारों में मेरी बहना है

जन्माष्टमी स्पेशल: ऑनस्क्रीन भगवान की "लीला"

जन्माष्टमी स्पेशल: ऑनस्क्रीन भगवान की "लीला"

त्यौहारों के सीजन में पहनावा, खानपान के साथ मस्ती भरा संगीत, धूमधाम हो तो त्यौहार का मजा दुगना हो जाता है। जब बात करें धूमधाम की तो बॉलीवुड को कैसे भूल सकते है।


चाहे कृष्ण जन्माष्टमी हो या फिर गणेश चतुर्थी, समय समय पर फिल्म निर्माताओं ने फिल्मों के माध्यम से दर्शकों को धर्म को मैसेज दिया और दर्शकों में भगवान के प्रति आस्था जगाई।


एक समय था जब लोग पुराणों के माध्यम से राम, कृष्ण, शिव और गणेश की गाथा सुना करते थे। वहीं गाथाएं अब हमें फिल्मी पर्दे व छोटे पर्दे के माध्यम से जानने को मिलती है। फिल्म निर्माताओं ने भगवान कृष्ण, राम आदि पर कई फिल्में बनाई।


जन्माष्टमी के अवसर पर पत्रिका.कॉम विशेष रूप से लेकर आया है वे खास फिल्में जो सिनेप्रेमियों को ईश्वर से जोड़े रखती है।

कृष्ण और कंस (2012)
इस एनिमेशन फिल्म में कृष्ण और कंस की पौराणिक कथा को बहुत ही अच्छे ढंग से पेश किया गया है। इसमें दिखाया गया है कि किस तरह कंस देवकी की सात बच्चों का वध करता है। फिल्म में कृष्ण की बाल लीलाओं को बहुत ही रोचकता पूर्वक पेश किया गया है। फिल्म आज भी बच्चों को बांधकर रखती है। इसमें कृष्ण और कंस की लीलाओं को 3डी में पेश किया गया है।


ओह माई गॉड (2012)
अक्षय कुमार स्टारर इस फिल्म में बताया गया है कि परेश रावल भगवान पर केस कर देता है। इस मामले में उसकी कोई मदद नहीं करता है। फिर अक्षय बने भगवान उसकी सहायता करते है। बाद में उसे एहसास होता है कि भगवान होते है। इस फिल्म में मंदिरों में फैले भ्रष्टाचार, पूजा पाठ, कर्मकाण्ड आदि को दिखाया गया है। भगवान के रोल में अक्की खूब जमे है।


लिटिल कृष्णा (2009)
इस एनिमेशन फिल्म में बाल कृष्ण की कहानी पेश की गई। इसमें लिटिल कृष्णा को बड़ा होने के साथ-साथ उसकी लीलाओं को पेश किया गया है। सत्य घटनाओं के साथ कहानी मनोरजंनात्मक दिखाई गई है।


राम तैरी गंगा मैली (1985)
डायरेक्टर राजकपूर की फिल्म राम तेरी गंगा मैली का कृष्ण राधा पर फिल्माया गया गाना इक राधा इक मीरा दोनों ने श्याम को चाहा... बेहद पॉपूलर हुआ था। इस गाने कृष्ण के प्रति राधा व मीरा के प्रेम के दर्शाया गया है। फिल्म ने हमेशा दर्शकों के दिल पर राज किया।


हरे राम हरे कृष्ण (1971)
देवानंद, जीनत अमान स्टारर फिल्म में ड्रग्स के खिलाफ संदेश देते हुए पश्चिमीकरण की समस्याओं को दिखाया गया था। देवानंद की खोज जीनत अमान इस नशे में डूब जाती है। फिल्म का गाना "दम मारो दम" बेहद लोकप्रिय हुआ था।


बाल गणेशा (2007)
इस फिल्म मे गणेश जी के बाल रूप को फिल्माया गया है। वे अपने बालक स्वरूप में ही सभी देवताओं को वश में कर लेते हैं। वे बहुत शक्तिशाली, बुद्धिमानी होते है। साथ ही वे बहुत नटखट, मासूम भी होते है जो दर्शकों खासकर बच्चों का दिल जीतने में कामयाब रहते है।


ओ माई फेंड गणेशा (2007)
राजीव एस रूईया निर्देशित इस फिल्म एक ऎसे 8 वर्षीय बच्चे की कहानी पेश की गई है जो अकेलापन महसूस करता है। उसके कोई फ्रेंड नहीं होता है। बाद में जब उसे गणेश की महिमा जानने को मिलती है वह उनकी आराधना करता है। गणेश उसके दोस्त बन जाते है और उसकी सारी समस्याएं दूर हो जाती है। फिल्म में बाल गणेश की कहानी को बहुत ही रोचक रूप से दर्शाया गया है।


छोटा पर्दो भी रहा कामयाब
भगवान की लीला को दर्शाने में छोटा पर्दा भी पीछे नहीं रहा। टीवी पर रामायण, महाभारत, श्रीकृष्ण जैसे सीरियल पेश किए है। इन सीरियल्स में पौराणिक कथाओं को पेश किया गया। अभी भी जब रामायण, देवों के देव महादेव आदि टीवी सीरियल आते है वे दर्शकों का मन मोह लेते है। 

Gandhi Jayanti Special

बॉलीवुड के हर दौर में यादगार, बापू का किरदार

दर्शन, विचार, आदर्श व्यक्तित्व का नाम आते ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की याद आती है। 2 अक्टूबर 1869 को जन्मे महात्मा गांधी ऎसी शख्सियत थे, जिनका प्रभाव हर क्षेत्र में रहा। यही वजह है कि कोई क्षेत्र उनसे अछूता नहीं रहा। भले ही वह हिंदी सिनेमा या बॉलीवुड ही क्यों न हो?


फिल्म निर्माताओं ने हर दौर में गांधी पर बनी फिल्में दर्शकों के समक्ष पेश की और इन फिल्मों के माध्यम से समाज को संदेश दिया। गांधीजी स्वयं एक दस्तावेज थे जो फिल्म निमाताओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत बने और इसी प्रेरणा को निमाताओं ने ऑनस्क्रीन पेश किया। इन फिल्मों के जरिए संदेश देने के साथ-साथ फिल्म निर्माताओं ने व्यंग्य भी पेश किए।


वैसे तो गांधी के जीवन पर कई डॉक्यूमेंट्रीज व फिल्में बनी। रिचर्ड एटनबरो की फिल्म "गांधी" से लेकर राजू हिरानी की "लगे रहो मुन्नाभाई" सिनेमाघरों में गांधी की आंधी चली। आज उनकी बर्थ एनिवर्सरी पर गांधी के नाम पर बनी कुछ खास फिल्में लेकर आया है पत्रिका डॉट कॉम



गांधी (1982)

महात्मा गांधी के नाम पर बनी फिल्मों में सबसे पहले नाम आता है तो वह फिल्म "गांधी"। रिचर्ड एटनबरों की इस फिल्म ने गांधी को ऑनस्क्रीन जिंदा कर दिया। इस फिल्म के जरिए फिल्म निर्माता लाखों दर्शकों को दिल जीता। इस फिल्म के एक सीन को कभी नहीं भूल सकते। वह है गांधी के अंतिम संस्कार में उमड़े जन सैलाब का। कहते है कि जब इस सीन की शूटिंग की गई थी तब 4 लाख लोग इकट्ठा हुए थे। जबकि केवल 25 हजार बतौर एकस्ट्रा कास्ट किया गया था और इन्हें ही सीन की पगार दी गई थी लेकिन इतनी भीड़ का इकट्ठा होना गांधीजी के प्रति प्यार था। बेन किंग्सले ने गांधी के किरदार में जान डाल दी थी।

स्टारर : बेन किंग्सले, रोहिणी हटंगणी।


गांधी माई फादर (2007)

फिरोज अब्बास खान निर्देशित इस फिल्म में महात्मा गांधी और उनके बेटे के कटु रिश्तों को फोकस करते हुए बेटे की मनोस्थिति दशाई गई है। इस फिल्म को नेशनल फिल्म अवॉर्ड में तीन अवॉर्ड मिले। एशिया पैसेफिक अवाडर्स समारोह में बेस्ट स्क्रीनप्ले का अवॉर्ड मिला। दर्शन जरीवाला को बेस्ट सपोर्टिग एक्टर का अवॉर्ड मिला।

स्टारर : अक्षय खन्ना, भूमिका चावला, शेफाली शाह, दर्शन जरीवाला


गांधी की शादी में जरूर आना

डायरेक्टर प्रणव धीवर की फिल्म "गांधी की शादी में जरूर आना" एक रोमेंटिक कॉमेडी फिल्म है। इसमें महात्मा गांधी और कस्तुरबा गांधी की लवस्टोरी पेश की गई है। इस फिल्म के विषय को लेकर विवाद भी हुए थे।


द मेकिंग ऑफ महात्मा (1996)

श्याम बेनेगल निर्देशित यह फिल्म महात्मा गांधी के शुरूआती जीवन की कहानी बयां करती है। गांधी जी के साउथ अफ्रीका में बिताये हुए 21 साल। महात्मा का किरदार निभाने के लिए रजित कपूर को बेस्ट ऎक्टर का नेशनल अवॉर्ड भी मिला था।

स्टारर: रजत कपूर, पल्लवी जोशी


बाबा साहेब अम्बेडकर (2000)

जब्बार पटेल की फिल्म "बाबा साहेब अम्बेडकर" असहयोग आन्दोलन की नीति और भूख हड़ताल को पेश किया गया है। इसमें नकारात्मक पहलु पेश किया गया है। ममूठी ने इस फिल्म के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार में बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड जीता था।

स्टारर: ममूटी, मोहन गोखले, सोनाली कुलकर्णी


हे राम (2000)

साउथ स्टार कमल हासन की फिल्म हे राम में नकारात्मक दृष्टि कोण पेश किया गया है। इसमें धर्म के नाम पर हिंसा दिखाई गई है। हालांकि गांधी का सकारात्मक रूप पेश किया गया है। यह तमिल फिल्म ओ राम का हिंदी वर्जन है।

स्टारर : कमल हासन, शाहरूख खान, रानी मुखर्जी


मैने गांधी को नहीं मारा (2005)

निर्देशक जानू बरूआ की फिल्म "मैंने गांधी को नहीं मारा" डिमेंशिया जैसी बीमारी से पीडित एक प्रोफेसर की कहानी पेश की गई है। उस प्रोफेसर को भ्रम होता है कि उसने गांधी को मारा है। अनुपम खेर इस किरदार में बिल्कुल फिट बैठे है।

स्टारर : अनुपम खेर, उर्मिला मातोंडकर


लगे रहो मुन्नाभाई (2006)

राजू हिरानी की फिल्म "लगे रहो मुन्नाभाई" ने दर्शकों को दिल जीत लिया। फिल्म में गांधीगिरी को दमदार तरीके से पेश किया है। फिल्म को जब जब भी देखते है ऎसा लगता है कि गांधीजी साक्षात हमें सत्य और अहिंसा की प्रेरणा दे रहे है। फिल्म के माध्यम से संदेश दिया गया है कि महात्मा गांधी की सत्य व अहिंसा की प्रेरणा से फिल्म का नायक अपनी जंग जीतता है और लोगों में लोकप्रिय होता है। फिल्म में कॉमेडी अंदाज के साथ बहुत प्रभावशाली मैसेज दर्शकों तक पहुंचाया गया है।

स्टारर: संजय दत्त, अरशद वारसी, विद्या बालन, बोमन ईरानी


रोड टू संगम (2009)

अमित रॉय निर्देशित इस फिल्म में एक मैकेनिक की कहानी दिखाई गई है जो एक कार की मरम्मत करता है और फिर उस पर गांधी की अस्थियां रखकर ले जाता है जिन्हें त्रिवेणी संगम में विसर्जित किया जाता है। वह मैकेनिक मुसलमान होता है। इस फिल्म के जरिए संदेश दिया गया है कि हिंदू और मुसलमानों एक साथ सहयोग से देश को प्रगति के पथ पर ले जाया जा सकता है।

स्टारर: परेश रॉवल, ओम पूरी, पवन मल्होत्रा


डॉक्यूमेंटीज

गांधीजी के जीवन पर बनी डॉक्यूमेंटीज में से महात्मा: लाइफ ऑफ गांधी और महात्मा गांधी ट्वेटिन्टएथ सेंचूरी यह दोनों बहुत चर्चित रही। लाइफ ऑफ गांधी में गांधीजी के जीवन की घटनाओं और उनके सिद्धांतों का वृत्त चित्र प्रस्तुत किया गया है।


केवल दो फिल्में देखी

गांधीजी के नाम पर कई फिल्में बनी जो दर्शकों के लिए प्रेरणादायक रही। गांधीजी ने अपने जीवन में केवल मात्र दो फिल्म देखी। वे हैं मिशन टू मास्को और रामराज्य। भले ही उन्होंने दो फिल्में देखी हो लेकिन वे देश में एक ऎसी पहचान, शख्शियस है जिसको ऑनस्क्रीन और ऑफस्क्रीन कभी नहीं भूलाया जा सकता।